किसी के दिल से दिल, मिल ही गया।
वो उतना अच्छा...
तो नहीं.. था,
पर अच्छा, सोचता... जरूर था,
जो कुछ,
थोड़ा बहुत कर पाता, करता भी जरूर था।
आखिर वो और करता ही…..?
लोग तो लोग, ठहरे!
चिपकन से! चिपकते ही हैं।
चलते चले जाते...
पीछे पीछे... लगे उसके,
जहां तक मतलब सधता...
कभी कभी मीलों चलते, सटे सटे उससे।
झाड़ी गई धूल सा
कभी कभी, कोई, कोई दूर हटते
कोई कोई तो
तिस पर भी चिपके ही रहते
सच बोलूं तो स्वार्थी सारे थे
जोंक के जैसे।
पर, जो जब साथ छोड़ते...
उसी दिन से...
उसका, मर्सिया पढ़ते।
दिन बीतते... गए,
लोग जुड़ते, छूटते... भी गए।
जाने न कितने... वाकिए
उसके और लोगों के साथ
समय की धार से होकर... गुजरे।
किसी का आप पर
इत्मीनान... होना,
किसी के दिल... से
आप का सराहा.. जाना!
आधुनिक पदक!
पाने से! बहुत बड़ी.. चीज है।
इत्मीनान... और दिल की बात...,
के साथ
आज की दुनियावी
उपलब्धियों का, कोई ताल्लुक
ही, नहीं है।
यह तो भीतर से, भीतर की बात है।
लोग कहते हैं,
सांच को ताप नहीं, पर देखा,
यह भी, सही बात नहीं।
एक दिन, अचानक
उसकी मुलाकात.. ..
एक बहुत बूढ़े, दिमाग से ढीले,
बात बात पर, करेले से कसैले,
लोगों से उपेक्षित,
काल की मार से पीड़ित,
अपने तक ही, हर तरह सीमित,
धूप छांव सी, आती जाती थी
जिसकी स्मृति, और विस्मृति।
जो …दूर बहुत दूर,
था जो, अब
अपने सारे कर्मो, दायित्वों,
गहरे बोधों से,
बस, स्पर्श करता रहता
बहती हवाओं सा दुनियां को
क्षण क्षण... अनुक्षण..
क्षण भर को पकड़ता, क्षण भर में ही छोड़ता।
केवल वर्तमान में स्थित!
लोगों को, अपनो को
या किसी को भी
यदा कदा पाकर
तिस पर भी
अतीव.. हर्षित।
कभी हंसता, कभी हिरस-ता
कभी वह!
वाह! कैसी बच्चों सी, हंसी हंसता!
जाने क्या सोचता!
सोचते सोचते अचानक
रुंधे गले हबस-ता!
कह नहीं पा रहा हूं! आगे मैं ...
कैसे वह, भरे गले सिसकता!
चिरकती! पतली दरार सा!
उसी में से, धीमे... धीमे.. रो लेता।
झूमती खुशी!
और डूबते अवसाद!
के बीच
सावन के झूले सी पेंगें भरता।
लोग उठाएं तो उठता, बैठाएं तो बैठता ।
देखता...
कुछ इस... तरह!
जैसे कुछ बहुत खास!
देख रहा हो।
जेब में कुछ चीजें लिए,
जो भी हों
उनके लिए हर वक्त
चिंतित, चिंतित रहता।
कभी उन्हें किसी, मजबूत लिफाफे
थैले, कपड़े में रख, हाथ में लिए,
सुरक्षित जगह
की तलाश करता, परेशान बना रहता।
एक दिन!
भूल गया, अचानक वो!
पाकेट उसके कपड़ों में भी थीं,
मैने जैसे ही याद दिलाया,
उसमे रखवाया
वो चीजे उसकी, वह
सावनी बयार की शीतल
हवा में झूम गया!
इसी को तो खोज रहा था, कितने दिनों से?
कुछ ऐसे बोला, जैसे उसे
कभी का खोया जहांन, मिल गया।
क्या यह मुझसे रूठ गई थी,
पास ही तो थी,
पर मुझे मिल ही नहीं रही थी,
जबकि ये मेरी ही थैली थी।
वैसी हंसी, वैसा आनंद
वैसा इत्मीनान।
न ही देखा, न महसूस किया है
आजतक कभी, अपने पूरे जीवन में, मैने ।
तभी उसने
ध्यान से देखा मुझे,
और बोल उठा!
क्या कहूं कैसा लहजा था,
लहर सागर की हो... तो भी..
उन लब्जो के आगे...
झुक... जाए! रुक... जाए!
इत्मीनान... कैसा,
ठोस लोहा हो बिल्कुल... वैसा!
मेरे लिए
मेरा देवता ही बोल उठा!
”ये, ये, जो बैठे हैं,
पास मेरे
बहुत बड़े आदमी हैं।
तुम लोग अब, जाने हो इन्हें!
मैं जानता हूं
तब से इन्हे
जब मै ऐसा नहीं था! ऐ लोगों !”
सुनकर इसे
आज इतने दिनो बाद
अपने करमों पर मुझे
अब जो इत्मीनान हुआ।
वही मेरा सच्चा, पक्का ईनाम हुआ।
सच कहूं! आज जाना
इतने दिनों बाद,
तब भी कुछ लोग थे
जो मुझे मूर्ख समझ, केवल
लूटते नहीं रहे...
मेरे करमो पे, शायद, दिल से भी खुश रहे।
न कि और लोगों की तरह
जो हटते ही
मेरा मर्सिया, लगते थे पढ़ने।
इतने सालों की,
मेरी की गई नीमतों का सिला
आखिर मुझको मिल ही गया।
एक आदमी ही सही
किसी के दिल से, दिल मेरा, मिल ही गया।
जय प्रकाश मिश्र
शीर्षक: आज कुछ लोगों की जिंदगी
मैं नहीं सोचता हूं,
ज्यादा अब, घर में...घर के बारे में
सच! इसीलिए बचे क्षण...
शांती से... जिए जा रहा हूं
ऑटोमैटिक कार में
बाएं पैर सा
बेवजह, करना कुछ नहीं
बेकार का टेंशन
क्यों लिए, जिए जा रहा हूं।
जय प्रकाश मिश्र
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