एक पिटारी बच गई थी, ढो रहा हूं।

पद प्रथम: राम, राजा आज भी हों, 

पांच सौ साल बाद, अयोध्या में आदि-सर्वमान्य सनातन धर्म की धुरी प्रभुश्री राम की अस्मिता
को लोक में प्रतिष्ठा मिली। इस बार, पहली बार शुभ दीपोत्सव यहां विपुल हर्ष से मनाया गया इसी पर ये पंक्तियां प्रस्तुत हैं।

कोई! आने.. को है, 

उजाले.. कह रहे हैं.. प्रसरते,...ये 

धरा पर, इस, मुखर हो!  

साल चौदह बाद, 

या सच… पंच शत…के बाद! 

आतताई, ने किया था 

ध्वंश… जब से

हिंदू अस्मिता का! 

सोच तो.. एक बार! 

शत, ना! ना! पंच शत के बाद...

अयोध्या सज रही है, आज 

फिर….

कुछ इस तरह से..

लाजो, हो कोई! दुल्हन हो!  

नव्या नवेली! 

दिल कह रहा है, साथ इसके..

”राम” राजा आज भी हों, 

हम सभी के।

पद दो: जिंदगी! आखिर ये, है क्या? 

वाकई, अपना जीवन, सोचें तो, एक दीप सा, ही है, जल रहा। एक आग है जो जा बसी है स्वांस में घुस हम सभी के..। आगे पढ़ें..

जिंदगी एक.... जश्न है..

पर... दूर, से ही, देख तूं! 

रौशनी.. तुझको, सबब हो,

नजदीक मत आ.. आग है।

जल रही है... जब तलक

हाथ अपने.... सेंक तूं! 

हों गर्मियां, तुझको मयस्सर 

पास मत जा.... राख है।

दीपक, या सूरज दूर से सुंदर लगते हैं, ऊर्जा का रूपांतरण सौंदर्य और आनंद होता है वह स्वयं अग्नि रूप है। देह जलने वाली मोम सी है राख है इसे अच्छाई में अधिकतम प्रयोग करें।

पद तीन: मेरा घर

दुनियां की नश्वर चीजों से ही तो हम अपना प्यारा घर बनाते हैं। चीजों में जीवन नहीं होता, बेजान होती हैं, जिंदगी मात्र प्यारी और गौरवशाली यादों की किस्ती ही है। सारे अरमान पूरे होकर छीजते ही हैं एक दिन, खत्म हो जाते हैं। बस जो काल अब हाथ में है वहीं अनखुली पिटारी है, उसे अच्छे से खुश होकर जिएं। जबतक जिएं उन्वांन, जोश हाई रखे।

मेरा घर! 

घर... मेरा, अब क्या था? 

बेजान-जखीरा!  

जब इसकी जरूरत पड़ी तब....

कुछ निरलस.. यादें, लिए

एक पुरानी खेली.. हुई 

फटेहाल गुड़िया का...पुलिंदा..सा

वो भी बीती चीजों का, 

और क्या? 

क्या होता है बाद में ये घर! 

क्या बचता है इसमें...

अलावा... कि, कुछ पछतावे

छोड़ जाता है... 

बस हमारे लिए, पछताने के लिए।

छीजते हैं अरमान सारे.. 

धीरे धीरे.. धीमे धीमे..

कुछ बह चुके हैं... 

कुछ बह रहे हैं.. आज भी, 

देखता हूं आंख अपनी, सच कहूं! 

एक पिटारी बच गई है!  

उम्र की बस...

और यह उनवान पर है... आज भी

पिछली तरह.. ही सोचता हूं।

शेष क्या? अवशेष क्या! 

तुम ही बताओ, 

अगर सत्तर छू रहे हो।

जय प्रकाश मिश्र 

(मूल रचना स्वरचित) 

Comments

Popular posts from this blog

मेरी, छोटी… सी, बेटी बड़ी हो गई.. जब वो.. पर्दे से

पेंशन बिन जिंदगी, मेरी ये खाली हो गई है।

चलो पेरिस की एक शाम से मिलें!