आओ दिखाएं, जिंदगी के मोड तुमको साथ अपने।

पृष्ठ भूमि कथानक:  

सच! धूप-छांव, के तानों बानो से बुनी, झिलमिल, सलवटों में चमचम खुशियां समेटे और छायादार हिस्सों में गम को छुपाती, संभालती ये हम सभी की जिंदगी कैसे रेशम के सुनहले धागे सी, बालुका के ढेर सी दूर से रजत कणों का आभास देती सरकती जा रही है पकड़ना मुश्किल है। आइए कुछ संजीदा मोड, जो आते ही हैं पर इसका शायद अंतिम हल वही होते हैं जो अपने को यह की देवी सौगात में देती है उसे देखेंगे। यह बांधती है जीवन को और मुक्ति भी एक तरह, एक सिरे पर देती है. कभी कभी किसी किसी को जिसपर मेहरबान हो जाए। रूपक प्रयोग किए गए हैं, मार अर्थात प्रेम का देव, भुजंगिनी अर्थात काल की देवी नियति स्वयं। आगे आप पढ़े और आनंदित हो यह प्रयास है।

जय प्रकाश मिश्र

शीर्षक:  आओ दिखाएं, जिंदगी के मोड तुमको साथ अपने।

(स्वरचित मूल रचना) 

सच! झिलमिलाती

जिंदगी यह! किस कदर! 

मोड़ों पे उठ, उठ चमकती, 

छाया.. में छुपती, 

जा रही है, फिसलती 

तेरे हाथ से, तेरे पास में, 

इसे देख! तो, मेरे साथ में,..आ! 


कुछ.. मोड हैं, 

इस जिंदगी के.. रास्तों पर..

सरपट नहीं ये दौड़ती.. है, हर समय

कुछ दूर चलकर.., 

ठिठकती है; 

पीछे को मुड़.. अवलोकती है, 

नादान बच्चे.. की तरह.. 

आवाक्.. होकर!  देखती.. है।


उंगलियों.. को छोड़कर.. 

रंगी.. ग़ुबारों.. की तरफ।

छूट ना पाए कोई, भी! 

आस लेकर..पास उसके, दौड़ती है,

चिपकती है, 

छूटने.. पर, टूटने पर..

सिसकती.. है, अहकती.. है, 

इस उम्र में, जद्दोजहद के बीच से 

यह.. गुजरती है।


टूटतीं… भी हैं, 

कोई एक्! रोज ही, मैं देखता हूं! 

खिलखिलाए-रोज़ सी, 

मनसिज सरीखीं, प्योर..सी

कच्ची कली की, उम्र में, 

नर्मोमुलायम.. हाय! वे  

भावना की मार से.. बिंध,

प्रेम के उस बान से विंध् 

”मार”.... ने जिनको चुना है,

अपने लिए.. इसी काम से..

तड़पती मछली सरीखी, 

मृत्यु का ये बरन करतीं..

और फिर बस, वहीं तक,

संसार इनका यहीं तक ।

और फिर क्या? शेष सारा शेष...! 

अपनो के लिए 

एक रिक्ति सूनी, छोड़तीं हैं।

  

जो बचीं, वो आगे बढ़तीं 

छोड़.. सबको.. 

एक दिन..किसी एक, 

का, ये संग करती..

जूझती है, उम्र भर..।

और क्या? 

अरे फिर…क्या! 

अरे फिर..! क्या…

यही तो...

सारी उमर.. रोती, बिलखती..

कभी हंसती, कभी गुमसुम बैठती

एक… कोई, खिलखिलाती..

मिल है जाती देखने.. को।

शेष सारी! 

खप हैं जाती, मर है जाती रास्तो पर..

ऊंचे नीचे, गिरते पड़ते... 

पार पातीं.. मुश्किलों से, और क्या?  

यही तो है मोड, न्यारी जिंदगी का।


एक मोड… है, 

इस रास्ते पर..जिंदगी के…,

आयेगा.., चलते रहो…

कुछ दूर है..दिख जायेगा.. 

धुंधलका थोड़ा..वहां हो जाएगा, 

पूर्व.. उसके।

वो खास है, तुम बढ़ो, बढ़ कर चलो..

चलते रहो।

आहटें! 

आहटों पर ध्यान! दो मत, मत रुको..

श्रमविंदु को आने तो दो।


दौड़ तेरी तेज होगी, देखकर वह बाग़बां, 

डरो मत! डरो मत! आगे बढ़ो..

अभी तो तुम चल… रहे हो, 

दौड़ने… खुद ही लगोगे, 

रंग पूरा चढ़ तो आए.. 

चादर थोड़ी ये भीग जाए

...जिंदगी की, इसलिए 

आगे चलो.., बढ़ते रहो।


फेस पर कुछ लालिमा 

सी उतर आए..

ताम्रवर्णी झिलमिलाहट.. झलकने 

जब खुद लगे, 

डूबते सूरज.. की लेकर पीलिमा..

तब तक रुको मत…।

भागते वो थक तो.. जाए,

इस इस खेल में वो डूब जाए।

तब तक चलो..।


क्या थक..चुका है, थम.. रहा है

हांफता.. बेदम… हुआ है,

खो रहा है.. धीमे धीमे

स्मृति वो, पूर्व की 

अब, बस! 

रुको..! 

आ गया है मोड़! वह 

जो दिखाना था तुम्हें ,याद करना, 

देखना तुम 

ध्यान से,.. 

समझना बेशक इसे! 

पर दूर रहना मोड़ से इस.. 

बन पड़े जितना तुम्हे, तुम याद रखना! 


पर आएगा, ये, एक दिन! 

हर जिंदगी में। 

थोड़ा सही, पर पूर्व ही, प्रस्थान के।


देखते ही देखते ये क्या हुआ..

जो थका था, दौड़ कर 

वो.. है कहां! 

है.. यहीं; जाता.. कहां, 

पर.. दूर है वह, हाय!

अब, इस दौड़ से, 

पूर्व की हर स्मृति से..।


एक कोई.. 

नट-नटी सी, नर्तनी.. 

लहर खाती, 

झूमती वो भुजंगिनी..

आ… गई, फिरती… फ़िराती.. 

उसी दिन.., वो फिरिंगिनी,...

देखकर… उसको.. बंधा 

इस काल के संजाल में, 

फंस गया है..थक गया है..

हाय! कैसा हो गया है..

बे-तरह, अपने बनाए जाल में,

यह उलझता, खुद फंस गया है

सुलझना मुमकिन नहीं है।

रास्ता कोई नहीं है..

देखकर, सब भांपकर..

डंस गई, दे जहर चुपचाप, 

वह तो... ले गई, 

संग साथ अपने, भूत… उसका।

स्मृति भंडार उसका, 

संवेदना का भार उसका..

इसलिए वह मुक्त था,

इसलिए वह मुक्त था।

मोड था यह जिंदगी का।

मोड था यह जिंदगी का।


है बचा अब, कुछ नहीं.., 

वह मौन.. है, 

शांत है, संतुष्ट है, 

हर दौड़ से वह मुक्त है।

बह रहा है नदी सा, 

पर जानता वह, यह नहीं…

"वह.. कौन है! "

मोड है यह जिंदगी का! 


फुलवारी… लगायी, थी कभी

बड़े शौक से...

सींचा… जतन से, उम्र भर; 

पौधे हुए, आगे बढ़े, फूले फले, 

और क्या? 

और क्या! समय से चलते बने…।

अब खिलखिलाते हंस रहे हैं साथ अपने, 

दावतें भी उड़ रहीं हैं, साथ अपने...

पर…. वह,

वह, आज मौन है, 

सब देखता.. चुप चुप खड़ा है, 

सोचता!  क्या? 

वो ही जाने ..

जिंदगी का मोड है यह,

जिंदगी का मोड है यह।

अपनी टिप्पणी देंगे तो मैं सुधरूंगा।

जय प्रकाश मिश्र








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