आज फिर हम खोजते हैं, बचपने को।
भाव भूमि परिचय: बचपन प्रिय बचपन
बचपन अद्भुत और बहुत निजी होता है। सबके हिय के पास, सदा बसता है। उसकी यादें मन के कोमल कोयों में, सदा अवस्थित रहती हैं। जब उस समय का कोई साथी वहीं अचानक मिल जाता है, तो उस ऋतुकाल और अवस्था की अनन्यतम अनुभूति, अनुभूत होने लगती है। इसी पर मेरे भी कुछ शब्द देखे।
किसको.. ढूंढते हैं..,
क्या वही.. बचपन, कुंआरा..
पहले वाला.., कूदता..
जो खो गया.. था,
पास ही.. इस गांव में..
यहीं.तो., इस मोड पर..,
तब,.. उस समय,
बंझुल-नहरिया के हिए
छतनार-बिरवा के तले,
याद है! मुझे याद है!
तूं.. याद कर!
उस बार..!
जब, हम-तुम, मिले थे...
पांच दशकों... के भी पहले.. !
"वो" आप ही.. थे,
"मैं" जोहता…तुमको, यहीं
बूढ़ा.. हुआ हूँ
चलो..अच्छा हुआ,
तुम मिल.. गए,
आज फिर एक बार, भल अच्छा हुआ,
देख तो!
यह खट खटहवा आम अब भी
हंस रहा है ठीक वैसे..
पाकर हमें.
चलो.. एक तोड़ते.. है
आज फिर इसका टिकोरा.. ख़टलुसहवा
ला रहा हूं, नमक.. मै पीसा.. हुआ
पात पर रख, लो अभी इसी बाग में..
और.. फिर
संग.. चाटते हैं,
फांक इसकी ख़टलुसी
"कोट" कर कर दांत..
फिर एक बार, हम तुम,
एक संग
ही कूदते है, बालपन सा
इस नहरिया बीच..
पुनि पुनि.. भीगते हैं,
खोजते हैं बचपने के..
"चांपाकल" को,
पंडित के दुआरे, जो लगा था
आह! फिर से
वही ठंडा-मीठा पानी..
सुड़कते और खांसते हैं।
इस निचाटे, दोपहर को,
दुपहरी जब नाचती है,
भर सिवाने, झुलसती है,
चलो! इस बाग में हम खेलते हैं।
और आज फिर हम
खोजते हैं, बचपने को।
जय प्रकाश मिश्र
शीर्षक: रचना कार है वह!
सुगंध है वह वाटिका का
तरल हृदया रूप है
तैरता है पवन के संग
स्पर्श से वह दूर है।
कौन कहता... है
उसे दरकार... है
कुछ रुपयों... की,
वह तो सदा,
सिर... पर, रहा सिरमौर है।
महकता,
चंदन सरीखा..
देवता के सिर चढ़ा,
मानव नहीं, हर देवता के
माथ पर स्थित रहा।
वह मंत्रपूता, काव्य रचित्ता
जो हृदय है….
मूल्य!
मूल्य उसका… कौन देगा!
वह ही यहां..
यदि बिक… गया तो
सत्य हा!
किस ठौर होगा।
जय प्रकाश मिश्र
तृतीय पुष्प: संक्षिप्तियां
सुर ने बनाई थी सुरा
अपने लिए क्या?
आसुरी संपद हुईं यह
किस तरह सब जानते हैं
भाव: हर निर्माणकर्ता चीजों को कभी भी मात्र स्वार्थ से प्रेरित होकर नहीं बनाता पर यहां एक ऐसा वर्ग है जो स्वार्थ के वशीभूत उसका व्यापारीकरण और लोगों को उसके लिए अधिकतम एडिक्शन पैदा कर देता है। और इस तरह उनके अपने लाभ के चलते लोग आदतन उनका प्रयोग करने के लिए बद्ध हो जाते हैं। प्रहार व्यापार की संस्कृति पर, आज के बढ़ते पूंजीवाद में लाभ कमाने की प्रवृत्ति पर किया गया है। जो चीजों को लपक कर पूरी निरीह जनता को पंगु बना देती है। सादर व्याख्यायित।
जय प्रकाश मिश्र
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