मेरी यात्रा, मेरा परिचय कौन था मैं।

संक्षिप्त कविता: यात्रा मेरी, परिचय मेरा

पृष्ठ भूमि: हम सभी हर काल में कोई न कोई रूप, रंग, आकृति या गुणरूप हो, अपने अस्तित्व या आत्मतत्व के साथ, इस सृष्टि में युग युगों से निरंतर चलायमान स्थिति में उपस्थित रहे हैं। जहां आज हैं वहां पहले भी, इस जीवन चक्र में गुजरते परसों यानी कई स्टेप पहले ही नहीं, समय की इस अवधारणा के पूर्व भी रह चुके हैं। कोई भी चीजें या तत्व, प्राणी जो हम देखते है वह कभी हम भी रह चुके हैं। हम जल, बादल, अग्नि, पवन, पेड़, लता पुष्प, धनी, गरीब, साधु सब बनते हुए आज यहां इस रूप में इस नियति की जरूरत अनुसार उपस्थित हैं। जीवन चक्र और इस समष्टि को यात्रा का एक चित्रण आपके संज्ञानार्थ व मनोरंजनार्थ प्रस्तुत है। पढ़े और आनंद लें।
(स्वरचित मूल रचना) 

मैं फिर वहीं हूं.. 

परसों जहां था..

कल कहां था? 

बरसों जहां था! 

आज  हूं..मैं, साथ तेरे..

क्या.. काफी,  ... नहीं है,

मैं तब... भी... था..

जब, आज, कल, परसों .. जिसे 

तुम बोलते हो

यहां, यह कुछ..., नहीं था।


अरे! 

यह तो! 

घर मेरा है..

जाता कहां मैं! यहां से, 

हां, तब, यह सबकुछ 

ऐसा... 

द्युतिमय नहीं था।

सब लपट में... जल रहा.. था, कुछ धुआं.. था..

कुछ धुंध.. था.. 

सच सुनो! तब, मैं ही 

यह सारा "जहां"... था।


पूछते हो!  

आकृति! मेरी ये क्या है? 

सच कहूं यह नियति है, 

उसकी जरूरत से बनी है? 

मैं यहां हूं..

बन रहा हूं, देखना 

एक दिन... पूरा बनूंगा..साथ उसके..झूमता

छोड़ दूंगा, वस्त्र सारे... देह अपनी

जो लपेटे घेर मुझको, आज तक 

इतने दिनो से, ओंटे पड़े हैं। 

धुंध मन की साफ होगी.. 

निर्मल चमकते चांद सा.. मैं खिल उठूंगा।

पूर्ण हूंगा, एक दिन में पूर्ण हूंगा।


आग.. पानी.. से गुजरता!  

आंधियों के राह.. मिलता! 

गहराइयों.. में, पर्वतों की नींव में.. से 

निकलता, एक दिन, मैं

घाटियों में, फूल बन कर, फिर खिलूंगा।


कौन हूं! मैं! पूछते हो! 

रास्ता हूं!  दिव्य का.. 

मैं दिव्यता हूं..! 

भाग हूं मैं... बूंद हूं.. 

गरजते, लहरते, सागर सलिल.. का।


अग्नि था मैं, पानी हुआ था, बाद में... 

शीतल हुआ जब...

जा समाया धरा में.. 

पृथ्वी हुआ तब..

पेड़ के तन जा समाया... जड़ जड़ों में..

वाष्प बन मैं पत्तियों से निकल कर.. 

पवन के रथ बैठ कर... 

मैं.. घूम डाला 

पूरी धरा!  बादल बना जब, 

सोख कर जल बिंदु, सागर मध्य का 

पुन पानी हुआ.. 

और बरस कर... इस फसल ऊपर, 

उपज बन...अन्न बनता, 

आदमी में हजम होता

वीर्य बनता, 

गर्भ पलता.. एक दिन मानव.. हुआ।


पार कर मै अग्नियों के देश को...

दावाग्नि.. को, 

जठराग्नि... को, 

यज्ञाग्नि.... को, 

सागर के उर की अग्नि का, 

चिर अंश हूं मैं! 

पूछते हो कौन हूं मैं! 


सतत चलता.. 

जा रहा हूं, सतत चलता 

आ... रहा हूं

पूछते हो कौन हूं मैं!  

यही है परिचय मेरा, यही मेरा रास्ता।

भाव:  हम और यह संपूर्ण ब्रह्मांड एक ही हैं।पृथ्वी नन्हे नन्हे कण, मिट्टी आदि से ही बनी है।ईश्वर इससे अलग नहीं इसी में संव्याप्त है। सभी कुछ परिवर्तन की सतत यात्रा का भाग है। गति और ऊर्जा हर जीवन और मृत्यु में अविरल समाहित हैं।

जय प्रकाश मिश्र




 






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