गुप चुप बैठा तकता है वह! फोटो पे, लुभा जाता है अभी!

पायदान पहला: जिंदगी क्या थी मेरी

सच कहूं! क्या.. थी.. 

जिंदगी.... 

मेरी! 

बस!  तलब… थी,

सुबह से शाम.. 

तो.. हुई.. 

पर..ये.. 

पूरी.. न.. हुई।


मालो-असबाब.. 

सारे… हाजिर...

तेरी, ही

एक, कमी.. थी 

जीते जी..

पूरी.. न.. हुई।

पायदान दो:  दूर होती मनुष्यता

मानविकी, पीछे छूट गई..

देखा… 

वो! 

गहरे..! डूब.. गई! 

बौद्धिकता! 

अब..! बाकी है कहां!  

खोजूं उसको…किस ठौर यहां! 

संस्कृति… नाँदाँ के.. 

पल्लू बंधी.., 

स्लाटर हाउस के पास खड़ी..

देखा मैने.. 

आंखों अपनी।


मैं....,

क्या.. क्या,…करूं..! 

वो, अब भी वहीं

गुप चुप बैठा...तकता है वहीं…!

फोटो पे, लुभा... 

जाता है अभी…! 

रोटी की... 

उसे तो फिक्र नहीं..।

डियोड्रेंड के… 

खुशबू की खातिर

मर मिटने तक… वो 

है.. हाजिर!  


मत पूछ! 

मुझे!  

क्या क्या देखा? 

इस पार! यहां,  मेला.. देखा…

सेंस…यहां.. इतना बदला..

टूटी सैकल में! टैर नहीं! 

मर्सडीज के मॉडल में उलझा।


कुछ थे, 

उसको समझाते रहे,

छुप छुप के, तीर.. चलाते रहे,

कागज को रंग, काले पीले 

दौड़ाते रहे, दौड़ाते रहे…।

नाटक खेले, 

बहसें भी किए..; 

गुप चुप मीटिंग भी करते रहे..

पर चमक.. अधिक थी, स्वारथ की,

चुंधियाती, आंखे मूंदे रहे, 

दिवाली की... दीया भरमी...।


घर के मटियाले बर्तन को

पैरों के तले रौंदा उसने,

और मानविकी!  

चुपचाप वहीं

भूखी बिटिया के आंखों सी

असहाय खड़ी रोती ही रही।

गहरे और गहरे गड़ती गई।

छूट गई, वो छूट गई! 

देखा मैने 

वह डूब गई! 


अब, देखो! 

कब! लौटेगा वो! 

कब! अपनों की सोच!  

करेगा वो।

या मुफ्त की रोटी खा खा कर

अपने को बेंच मरेगा वो।

स्वरचित मूल रचना

जय प्रकाश मिश्र



Comments

Popular posts from this blog

मेरी, छोटी… सी, बेटी बड़ी हो गई.. जब वो.. पर्दे से

पेंशन बिन जिंदगी, मेरी ये खाली हो गई है।

चलो पेरिस की एक शाम से मिलें!