शुद्ध जल की मुख्य धारा में नहा, विश्राम कर!
जीवन उदधि के बीच में,
लहर लेतीं, उर्मियों पर!
सांसारिक लालसाएं!
घर बनातीं, चिपकी हुई
संग चल रही हैं
फेन बन बन!
फैलती हैं, पृष्ठ ऊपर,
घेरती हैं,
शुद्ध जल को
बाहुओं में, धीरे धीरे,
देख तो! कुछ देख तो!
इसलिए!
तूं छोड़ इनको!
अब यहीं पर!
पार कर!
संघर्ष कर!
शुद्ध जल की
मुख्य धारा में नहा,
विश्राम कर!
प्रभु के निकट आ विश्राम कर,
विश्राम कर!
बह रही नदिया में जैसे
तिर रही हो,
तरी कोई,
कागजों की तली लेकर।
बह रहा
तूं भी निरंतर,
संभावना के सलिल में
प्रत्येक क्षण, हर एक क्षण।
इसलिए अब छोड़ सब कुछ!
शुद्ध जल की
मुख्य धारा में नहा,
विश्राम कर!
प्रभु के निकटआ, विश्राम कर,
विश्राम कर!
यह "विकल यौवन"
खिलखिलाता, मद भरा
जो आज तुझको दीखता है ‘उफनता’
यह फेन है!
इस विश्व के उपचय पचय का!
समय सरिता की नदी में।
तैरता घुल जाएगा!
देखते ही देखते!
संभल जा इस झाग से
बहती हुई यह गंदगी है,
सफल कर निज जिंदगी को
समझ तो, यह बंदगी है।
इसलिए अब छोड़ सब कुछ!
शुद्ध जल की
मुख्य धारा में नहा,
विश्राम कर!
प्रभु के निकटआ, विश्राम कर,
विश्राम कर!
देख तो!
जिसको तपस्या लीन देखा
सो गई होकर उदास!
भ्रांतियां सारी जगत की।
शक्तियां सब पास आकर,
जगत की इस,
मूर्ति के उर! गले लग कर,
एक हो बहने लगीं।
बीतते ही बीतते चलते गए,
जाने न कितने, युग युगों संग,
सूर्य में डुबकी लगाकर
समय सरिता में नहाकर, खो गईं ।
इसलिए अब छोड़ सब कुछ!
शुद्ध जल की
मुख्य धारा में नहा,
विश्राम कर!
प्रभु के निकटआ, विश्राम कर,
विश्राम कर!
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