राग भैरव बज रहा है, गिरती हुई इस बूंद से
नेपथ्य में ही बैठ कर,
पट कथा लिखता हुआ
यह कौन है?
बैठा हुआ!
इस विजन बन में;
गिर रही उस बूंद सा,
रिमझिम बरसती
सतत हैं,
पेड़ की इन पत्तियों पर
मौन हो, अनवरत टप टप।
गा रहा है, गान जिसका,
ये पनाला बह रहा;
इस छोर पर,
आवाज करता बह रहा है।
क्या लिख रही है?
बिंदु सी, गिरती हुई, यह बूंद दुबली!
फैली हुई जलराशि के...
इस पृष्ठ पर ऊपर... देखता हूं।
मीठी मधुर मुस्कान भर
बहती हवाएं, चल रहीं हैं
सघन वन में,
घूमती वन बालिका
सी विचरती हैं।
राग भैरव बज रहा है,
गिरती हुई इस बूंद से
दूर नीचे भर गए,
गंदले गदोले पेट से
ढब ढबाढब सुन रहा हूं।
कितना मधुर संगीत
रिनी झीनती
किसी सारंगी का...
बज रहा है...,
कर्णप्रिय यह!
लग रहा जोगी कोई
गाता बजाता... जा रहा है,
गांव की गलियों में फिरता...
भरथरी का... गान करता..
आज फिर से।
सुन रहा हूं,
खो गया हूं,
पीछे पीछे जा रहा हूं
छोड़ कर घरबार मैं भी
साथ उसके विजन बन में।
ओस सी मासूम
नन्हीं बूंद यह!
छू रही है!
नमी बनकर देह मेरी;
डूबता मैं जा रहा हूं, उर उदधि में।
रुनझुन मचाता,
एक लहरा आ रहा है;
दूर से दौड़ता, घुड़ दौड़ करता।
मचलती ये पत्तियां
फुनगियो से कह रही हैं,
धान की इन बालियों को कोख में ले।
रेंडती पूंजा बनाती झूमती
फसल बैठी खेत में
कुछ कह रही है,
आज मेरे कान में, फुसफुसाती...
पास... से।
जय प्रकाश मिश्र
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