पुष्प प्रथम: शक्ति का आभास दर्शन
कुछ बीज यव के
मैने समोए, बीच मिट्टी,
नम जहां थी।
ढक दिया,
कुछ पत्तियों से
छिड़क पानी,
छोड़ कर मैं हट गया।
आंखुरे,
सुंदर सुनहरे
निकल आए, देखता हूं!
स्पंद! प्यारी प्रकृति का स्पंद!
मिट्टियों में! बीज में!
नमी में! इन आंखुरो के रूप में!
मैं देखता हूं।
शक्ति है,
तुम कुछ कहो!
स्पंद पहला, यही है!
जो जन्म लेता है वहां उस
धुर अंधेरे!
खोलता है बीज को,
आखूंरों को काढ़ता है,
जाय बनकर पनपता है।
यह शक्ति है।
इस जगत में, चुपचाप
आंखे खोलती है, देह धरती
आगे बढ़ती,
आंखुरों का रूप लेती
बिहंसती है।
कामना मेरी! अरे हां!
वह!
कामना मेरी! प्रबल है।
पालती इस विश्व को
कुछ इस तरह फल फूल देकर,
शक्ति है, वह शक्ति है!
हर तरह से पूज्य है।
प्रकृति की देवी है यह, शक्ति से परिपूर्ण है।
भाव: वह आदि शक्ति सर्वमय और कल्याणी है। सभी के लिए सुख और समृद्धि कारी है। बीज के अंकुरण से पुनः पुष्प, फल और बीज बनाने में सतत तत्पर रहती है। उसे हम इस रूप में अनुभूत कर सकते हैं।
पुष्प द्वितीय: शक्ति का सौंदर्य दर्शन
रूप बिखरा... विश्व में
पत्तियों में, फूल में...
हर वस्तु में,
हर क्षण यहां।
हर जीव में, जल में, गगन में,
बादलों में, अग्नि में
बन, बगीचों, अंतर्मनों में
देखता हूं!
रूप यह उस शक्ति का
सर्वत्र ही, मैं देखता हूं।
अभिव्यांजना, रंग रूप की
सुंदर यहां है,
हर चीज खुद में पूर्ण कैसे
खुद यहां है।
एक घाटी, दूर तक सुषमा समोए
आप में,
स्वर्ग की प्रतिमा यहां है।
चुप खड़ा, भीगा हुआ, हिम से ढका
पत्थरों का अंनगढ़ा
फैला हिमालय, सुंदर यहां है।
भाव: वह आदि शक्ति सौंदर्य प्रिय है, उसकी सारी सृष्टि सुख और सौंदर्य से लदी पटी पड़ी है। शुष्क पाषाण, जंगल, घाटियां सब में अवर्णनीय सुषमा अटी पड़ी है।
पुष्प तृतीय: शक्ति का शक्ति दर्शन
शक्ति है वह सतत नूतन
जर जरा से दूर है,
गरजती है वायु बनकर
कड़कती है बादलों में।
चमकती है बिजलियों में
दूर तक..वह देख तो!
बरसती है बादलों से,
बह रही है भूमि पर।
घनघोर गर्जन कर रही
वह जंगलों में,
काटती पाषाण को
निशिदिन बनाती रास्ते
ज्वार भाटा बन मचलती
सागरों के तट, सुगढ़ पर।
विश्व को सुंदर बनाती जा रही है,
शक्ति है! वह शक्ति है!
जय प्रकाश मिश्र
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