सच कहूं! एक,'अहम' ही है
पद प्रथम: प्रेरणा से परिवर्तन
धन और ऋण
हर कण में,
हर ज्ञांत इकाई में
मानव ही नहीं दानव में भी
एक से ही होते हैं।
सारा खेल, सारी दुनियां
सारा क्लेश, सारी समस्या
इनकी स्थितियों की ही दुर्व्यवस्था।
अव्यवस्थित व्यवस्था में
स्वतः परिवर्तन संभव है!
बस एक विशिष्ट प्रेरक
चुंबक, की जरूरत है।
जिसमे....
सारे धन के सिरे दाएं हों क्रम से
ऋण के सारे सिरे बाएं, व्यवस्थित हों,
मात्र इसकी उपस्थिति
काबिलियत या शक्ति,
जो भी कहें...
उसे वहां रखें...
उसकी प्रभा देखते,
आप देखेंगे
जो उल्टे आधे बैठे है,
मुंह दक्षिण करके, खुद ही
उत्तर कर लेंगे।
एक दिशा होते ही
एक साथ, चलते ही,
एक जैसा सोचेंगे
एक लक्ष्य भेदेंगे।
तब समाज बदल जाएगा,
शायद काम आसानी से, हो जाएगा।
बस वह चुंबक गांधी सा सच्चा,
बच्चे सा अच्छा
और असली होना चाहिए।
जय प्रकाश मिश्र
पद द्वितीय: समय होत बलवान
तूं मगरूर न हो,
किस्मत है,
यहां बैठा
है,
जाने कितने, फुंफकारते,
डरावने, दहाड़ाते
तूफानी दरिया
को हमने,
इसी..
जमीं ऊपर, नाक.. रगड़ते
बूंद बूंद को तरसते,
सूखते, इन्हीं,
गर्मियों में,
देखा
है।
याद रख!
बड़ा, छोटा!
आदमी नहीं होता,
उसका समय होता है,
वही, उस समय भी, होता है,
जब, घुटनों पर मुंह रख,
अकेले अकेले रोता है!
सच कहूं!
एक,'अहम' ही है
जो सारी जिंदगी, हममें,
तुमने जिंदा रहता है।
Comments
Post a Comment