प्रेम का निखरा हुआ यह रूप ही! अनुभूतियाँ हैं जिंदगी की।
एक बाग थी,
खिलती
हुई,
फूलों भरी।
नवोढ़ा
सुगढ देह सी
फल, फूल,
कलियों से लदी, भरी पूरी...।
स्वस्थ, हरे भरे
पौधे,
साफ, स्वच्छ
चिकने, तने तने, गाढ़े हरे,
चमकते, सुंदर, सुकुमार
चौड़े, पत्ते।
रंग बिरंगी आभा समोए
गोद में।
फिसलता,
आंचल संभाले
नववधू हो! कुछ इस तरह...
अधखिली कलियां, संभाले...
मुस्कुराते, हंसते हुए,
कल के खिले,
झर रहे...
अलविदा कहते... फूल से,
गले मिलते हुए।
ओढ़े हुए रंग, कुछ ऐसे
रंग छलकाती
सुंदर प्रिंट की, नई चादर हो जैसे।
खींचा हो वितान हरियाला
कोने से दूसरे कोने तक।
लेकर सौंदर्य, औदार्य
अपने ऊपर।
कंधो पर बैठाए
इनकी लचकती डालियां,
चुलबुली, चहकती चिड़ियां
छोटीबड़ी, बड़ी छोटी।
बहुरंगी तितलियां,
भौरे, मधुमक्खियां
फूलों पर बैठे, बैठे झूलते,
करते अठखेलियां।
मधुकरी और मधुकरों को,
साथ ले यह
गुंजरित होता रात दिन!
सच! यह सुंदर बहुत था।
पर एक कोने!
कौन था ? रूठा हुआ!
मुरझुराया, झुरझुराया
चेहरा लिए, लटका हुआ, ।
देख उसको, इस तरह,
पुचकारता मैं,
शीघ्र ही, उस तक गया।
क्या हुआ? उदास हो!
कुछ तो बताओ,
पास आओ, मत छुपाओ।
बिल्कुल अकेले! मन मार बैठे,
एकांत में क्यों ? हाय! रूठे!
चुप रहा, कुछ देर तक,
देखता हर ओर अपने,
सिसकता, रोने लगा,
डूबता गहरे खुदी में,
दास्तां कहने लगा।
क्या करूं, मैं कहां जाऊं
फूल, कलियां कैसे लाऊं,
कोशिशें कर कितनी बार
बार-बार, बार-बार
मैं गया, हर बार हार।
देखता हूं जिस तरफ,
फूल बिखरे उस तरफ
मैं यहां एकांत में,
जाने न कबसे हूं पड़ा।
कोइ पास आता है नहीं,
न साथ मेरे है खड़ा!
इसलिए, मैं रूठ कर,
चुप यहां पर बैठ कर
देखता हूं बाग को,
रो रहा हूं आप को। (स्वयं को अपने ऊपर)
तुम ही बताओ क्या करूं!
आखिर मैं कैसे खुश रहूं ?
मैने कहा तुम व्यर्थ ही
क्यों सोचते हो! इतना सब ?
बात मेरी गर सुनो तो
बात अपनी मैं कहूं अब।
कुछ देखते हो
रोज तुम...इस बाग में ?
प्यार देता.. पेड़, अपने फूल को..!
नित देखते हो ?
...रोज झरते फूल हैं, उस पेड़ के!
तुम देखते हो ?
फिर बताओ!
कष्ट किसको है बड़ा,
जिसने जना, (अपनी कोख से पैदा किया)
या पास में जो है खड़ा,
चुप देखता, झरता हुआ!
तुम! प्यार दो.. इस फूल को..
अपना बनाओ...!
धूप जब इस... पर पड़े,
इसको बचाओ..,खुद झुलस जाओ!
जब खिले यह फूल पूरा
तुम मुस्कुराओ।
जब झड़े संग दुख मनाओ।
और क्या है, फूलना, फलना यहां पर!
प्रेम का निखरा हुआ यह रूप ही!
अनुभूतियाँ हैं जिंदगी की।
जाओ अभी खुशियां मनाओ।
प्रेम, करुणा ही बड़ी है
स्वार्थ से, परमार्थ से
हर राग से
इस जिंदगी में,
बात मेरी मान जाओ!
अब नहीं आंसू बहाओ!
जय प्रकाश मिश्र
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