पुष्प प्रथम: प्रेम
मन शिशु है
क्रीड़ा करता!
व्रीडा के इस
उपवन में,
संग चलती
जीवन-लज्जा
भोली बन इसके पीछे।
भाव: सभी मनुष्य स्नेह प्रेम की आशा में जीवन के सभी पक्षों में, स्थितियों में उम्मीद करते हैं। फिर भी लज्जा और संकोच उसे सदा अपनी कोमल चादरों में दबाए चलती हैं।
अन्तर का
दीपक जलता,
ले स्नेह तरल
अपनों का,
क्यूं चंचल हैं
पतवारें
नदिया के शांत हृदय में।
भाव: सारी सृष्टि के भीतर एक ही तत्त्व है, आनंद और मधुरता सभी के लिए इष्ट है। बाह्य रूप से परम शांत हृदय में भी स्नेह करुणा प्रेम की कोई न कोई लहर उठती ही रहती है।
क्या कोई है आ बैठा,
मन के इस रंग महल में।
यह दृष्टि परावर्तित हो
क्यों उसके संग चलती है।
भाव: जब अपनी इच्छा का कोई प्राणी मिल जाता है तो आदमी बाह्य और अंतर से बदलने लगता है।
किस किस को
ले डूबेगी
किस किस में से उभरेगी,
अपनी तिरछी चितवन में
वह रूप सलोना भर कर
किस करवट यह बैठेगी।
भाव: असमंजस प्रेम की परीक्षा है। लालच इसकी बाड़ है। एकाधिकार ही इसकी समस्या है। शेष आप मित्र समझदार हैं।
है! कौन देवता भ्रमता!
मन में अशरीरी होकर।
तन तरल हुआ जाता है,
सच! विकल हृदय यह लेकर।
भाव: प्रेम अशरीरी है। पर बलवान है। तन मन चितवन सब मथ डालता है। अच्छे अच्छे लोग विकल होते देखे गए हैं। क्रमशः आगे
पुष्प द्वितीय : मैं और मेरा दर्पण
उत्कंठित मन
लहर बनाता,
सपनों के नीले दर्पन,
आकुल तन
भंवर सजोता,
स्वप्निल तंद्रा कर अर्पन।
भाव: मन संसार के बितान अर्थात तंबू चढ़ाता है, पेंग दूर की भरता है। स्वप्निल संसार की कल्पना करता है। और हम नींद से उचाट हो तन मन विभोर होने लगते हैं।
विकल अधर
कह सकते
यदि हृदयों की भाषाएं,
फिर आंखें क्यूं भर आतीं,
क्यूं अधर प्रकम्पित होते।
भाव: प्रेम शब्दों की सीमा से परे है। हृदय भाव पक्ष का, हमारी आंखे भाव पक्ष की, हमारे अधर की भंगिमा भाव से प्रचालित गवर्न होती है। भाषा प्रेम में शिथिल, न्यून पड़ जाती है। यहां आपकी भंगिमा उभरती है, आप रोक नहीं पाते। विवश हो जाते हैं।
पर्दों के पकड़ किनारे
क्यों नयन बावंरे झुकते,
क्यों धरा कुरेदी जाती
पावों के अंगूठों से।
भाव: विवश स्नेह और प्रेम लज्जा की चारदीवारी में संकेत का आश्रय लेते देखे जाते हैं।
ठंडक की कतरन
लेकर क्यों गाल गुलाबी होते,
क्यों अंगारे से तपते
हिम छादित पर्वत अंतर।
विवश हुआ मैं जाता
पग पग पर सब कुछ देकर।
क्यों पग मेरे खिंच जाते
स्मृतियां तेरी भरकर।
जब मिलन अधर बन जाते
शब्दों के सुंदर अक्षर,
उनकी मिठास घुल जाती
मेरे कानों में अंदर।
स्पर्श मुझे दे जाते,
उर के भीतर अंतर तक।
मैं मूक देखता रहता
सरिता की बहती कल कल।
तृतीय पुष्प: जीवन की भाग दौड़
मैं... पीछे, दौडा
जब देखा,
जीवन मुझसे आगे,
पिछला पग
क्यों
याद मुझे हो,
मन सपनों संग भागे।
जीवन सांझ
कहां खो जाती,
अरुण क्षितिज
जब चमके,
याद पुरानी अपनों की
अब
हिम नदिया सी मचले।
जय प्रकाश मिश्र
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