हां भाई! तेरा नंबर आ गया!
एक व्यंग कविता "अपने पर"
आखिर! कभी तो!
ये सबकुछ छोड़ना होगा,
यहां का।
जाना होगा, जरूर
कहीं न कहीं
नई जगह,
बसेरा लेने।
वो, कौन सी
जगह चुनूं
फायदे में रहूं,
आज की तरह
तब भी मस्त फिरूं।
अचानक
खयाल आया
सूर्य तो
सम्व्याप्त है सबमें!
बराबर!
क्यों न
उसी का हो! उसी को चुनूं!
उसी के घर जाऊं।
आमंत्रण!
स्वीकार हुआ।
आवाज आई! आ जाओ,
सुख से रहो, यहीं रहो,
इसे, घर समझो।
पर मैं,
ठहरा आदमी की जात!
स्वार्थी, विभ्रमी, चालाक!
कहीं खा न जाऊं मात!
इसलिए थोड़ा विचारा
फिर पीछे हटा।
दूसरा विकल्प
ढूंढा,
विकल्प की सुविधा है,
उधर से फिर आई आवाज!
चुन लो!
एक स्वर्ग भी तो है।
नहीं, हां,
मैं सूर्य में, गर्मी में,
इतना दूर क्यों जाऊं!
स्वर्ग जैसी सुंदर जगह
को ही, क्यों न चुनूं।
सुख सुविधा का असीमित भंडार।
माहौल भी कितना शानदार।
पर सुना है
वहां बच्चे नहीं होते!
वंश कैसे चलेगा अपना!
फिर जो जो संजोया,
चोरी बेइमानी कर,
अपना हिस्सा छोड़,
अपने पीछे
अपना सब कुछ!
किसे मैं दूंगा,
नहीं नहीं,
वहां नहीं! बिल्कुल नहीं
कहीं और चलूंगा,
अब कुछ
डिफरेंट सोचूंगा!
तभी अचानक
नाम ले के
किसी ने
पुकारा
हां भाई! तेरा नंबर आ गया!
चल, चल!
यमराज बाबा का रथ आ गया!
मैं घबराया! ,
क्या इतने जल्दी
ये सब हो गया।
अभी तो,
आगे का निर्णय
भी
पूरा नहीं ले पाया
यहां से मेरा टाइम
पूरा हो गया!
भाव: जीवन की कमजोरियां सही जीवन कहां जीने देती हैं। एकत्र करना, आगे की चिंताएं हमे निगल लेती हैं। सोच से ही हम सुखी और दुखी रह जाते हैं। अपनी संतान बेटे बेटी के जाल में मछली से फंस कर दुख भी नहीं पहचान पाते।
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