नदियों की ओढ़नी ओढ़े, सरकाती उन्हें लटकाती नीचे पैरों तक,

पृष्ठभूमि: कल्पना और स्मृति का एक सुंदर समन्वय वर्तमान में बनाए रखना चाहिए। इस समन्वय को अनुभूतियों में उतारने की कला ही जीवन में आनंद की आंतरिक धारा बना कर बहाई जा सकती है। अपनी सोच और उसपर सवारी आप को अनुभूति की गहराई में पहुंचा सकती है। आगे पढ़ें और अनुभूतियों की भुलभुलैया में चलें घूम आएं, मेरे साथ एक बार।

सोचता ही सोचता! 

इल्लियों से तितली बनता! 

पर निकलने की          (पंख) 

तमन्ना को संजोए! 

रात दिन! 

देखते ही देखते! 

एक दिन! मैं

उड़ गया।


बादलों ने थोड़ा 

झुक कर,

पीठ अपनी 

नीची कर दी,

सामने की 

उस पहाड़ी पार पीछे।

बैठा लिया, 

मुझको खुद ही पर ; 

और ये…लो, उड़ चला…मैं 

आ गया, लो.. 

यहां ऊपर! आज कितने! 


वाह,! इतना..बड़ा….,

इतना खुला…. ये आसमां?  

…. है! गाढ़ा.. नीला…

प्रदीप्ति अंतस में लिए, 

जो नीलमणि.. सा 

दमकता…है।

दुख दूर करता…, 

सुख बिछाता…, 

एक सुंदर 

समावेशी… चमचमाता..

सुनहरा..दिनकर लिए 

गोद में यह बिहंसता है...।

देख! यह सब, 

दंग होकर रह गया 

मैं, खुद ही में।


कैसि शोभा, आनंद कैसा,

ताज़गी अदभुत, 

विपुल वैभव

संजोए, 

सुअच्छ, शीतल, मधुर, प्रियतर

वायु को अंतर में भरकर

कलुष सारे खत्म।


मैं और मेरा, 

सारा का सारा ’मै पन’ 

छोटे, खोटे, नाटे, 

जो, जो थे विचार,और कर्म, 

मिट गए, धुल गया मैं 

अपने, अंतर्बाहर।


अभिभूत ! 

प्रेरणा में संभूत, 

घुल गया, 

अब मैं, मैं नहीं 

सर्वमय हुआ।

स्थान ! 

स्थान का अब वहां कोई

नामोनिशान कहां,

सबकुछ प्लवित, मिलता, छूटता

वहां जड़ता कहां। 

रुकना कहां! 


अस्तित्व अपना

एक ध्यान बिंदु बन गया,

सबकुछ द्रवित हो 

एक दूसरे में मिल गया।

कुछ भी अलग नहीं, 

न प्रवृत्ति, न निवृत्ति

अपना पराया विचार ही 

जाने कहां डूब गया।

निर्मल तन, निर्मल मन बचा

शेष सब!  शेष हो गया! 

 

समय! 

समय मेरे पीछे पीछे 

भाग रहा था,

अंधेरे को साथ लिए 

दौड़ता, हांफता 

काले कुत्ते सा, 

अवधि को दिनरात में 

बांधने के लिए 

परेशान हो, 

ब्रह्मांड में गरीब सा झांक रहा था।


दिन खत्म ही नहीं होता था।

प्रकाश और प्रकाश

निरंतर बढ़ता गया मैं

अंधेरे होते हैं, 

सोचना मुश्किल हो गया।

समय अपनी श्याम श्वेत की 

परिभाषा लिए

बहुत दूर रह गया था।


सागर एक मेखला 

बन चमकता था, गहरे नीचे, 

कभी नीला, 

कभी गुलाबी, 

कभी सुनहरा सा 

चमक उठता था पीछे।


उसकी लहरें 

उसकी स्मित 

मुस्कान बन

विखरतीं थीं सतहों पर।

लहरें, तरंगे, भयावह 

होती होंगी नीचे उसमे।

ऊपर से सुंदर, किलोल करती

मस्तियां लुटाती, नजर आती थीं।


पर्वत शिखरों पर

स्वच्छ तुहिन मुक्ताबंध बन

धरा के गले में चमक जाती थी।

गाढ़े हरे, कहीं धानी, 

चुनरी पहने ये धरा

नाचती, सूर्य के आगे 

दिवानी सी नजर आती थी।


नदियों की ओढ़नी ओढ़े, 

सरकाती उन्हें

लटकाती नीचे पैरों तक,

सिर हिमालय में गुंथी मणिश्रेणी 

से बांध नीचे उतरती 

नदियों की ओढ़नी लिए 

अपने पृथुल अंगों से 

लटकाती जाती थी।


एक दिन बादलों को 

प्यास लगी उड़ते उड़ते,

सागर के बीचोबीच 

वे उतरने लगे, 

धीरे धीरे, हल्के हल्के।

वाह! क्या छक के! 

पिया पानी सबने मिलकर

भर ली सबने अपनी अपनी 

सारी थैलियां, जेबें, 

आस्तानी जमकर।


अब उड़ान नीची थी,

देह भारी थी, 

सच कहूं तो प्यासी 

धरती पर बरसने की 

तैयारी थी।

पीठ नीची हुई 

फिर एकबार 

उस पहाड़ी तक।

मैं भी उतर ही गया, 

खुद ही इस पहाड़ी पर।

देखते ही देखते 

मैं दुनियावी हुआ 

मेरा, अपना, 

अपनों के रंग में रंगा

दुनिया के तुच्छ 

जीवन में भीगा

मायावी हुआ।

तृषित, दुखित, 

सीमित हो 

सीमित बंधनों में बंधा।


आतीं हैं पास आतीं हैं

आज भी बदलियां मुझे बुलातीं हैं

सावन के दिनों में नमीं 

अंक में भरकर, 

नीचे धरती पे उतर जाती हैं, 

अपने हाथो से मुझे 

कभी कभी प्यार से छू 

के उड़ जाती हैं।


अब समझ आया

कितना फर्क होता है 

अच्छे लोगों के पास रहने में,

निसर्ग में उतर, फिर

इसी जिंदगी को जीने में

अपने पराए से दूर, 

स्थान और समय की 

सीमाओं से परे रहने में।

जय प्रकाश मिश्र










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