सब तुम पर अपने फैलाए, जाल से जिंदा हैं

आओ झांके दुनियां में क्या है, अंदर 

घर उसका, बहुत ऊंचा था! 

राजा का महल?  

सच में...! उससे 

बहुत... नीचा था! 

भाव: बहुत बड़ी चीजे हमेशा छोटी चीजों से ही मिलकर बनती हैं, स्वयं में उनका कोई अस्तित्व ही नहीं हो सकता।

राजा के महल को 

मजबूत आधार की जरूरत थी। 

मजबूत आधार को 

मजबूत भरोसे के लिए, 

अपने नीचे 

उस घर के छत की

निहायत जरूरत थी।

भाव: हर विशाल और भव्य दिखने वाली चीजे छोटे कामगीर और श्रमिक ही तैयार करते हैं। बिना परिश्रमी, लगन शील और मेहनत कश लोगों के कुछ भी नहीं हो सकता।

ऐसे तो! वह और उसका घर! 

दोनो बहुत नीचे थे! 

पर राजा और राजा का महल

दोनों को खूब पता था,

वे नीचे होकर भी 

उनसे बहुत ऊंचे थे।

भाव:  हर प्रतिष्ठित और ऊंचाई पर पहुंचे आदमी को पता रहता है की उसको वह पहुंचाने में ईमानदार और मेहनती गरीब लोगो का योगदान रहा है।

हां, हां बिल्कुल जड़ों की तरह 

जो पौधे को 

क्या कुछ नहीं देती! 

खुराक, स्थिरता, 

जीवन, सुरक्षा, 🏝️

पर यह उसकी नियति ही है; 

वह हमेशा सीलन और 

अंधेरे में रहती है। 

इतना ही क्यों, 

दिन ही नहीं, रात रात भर! 

बिन बोले काम करती रहतीं है।

भाव: यह नियति की व्यवस्था ही है की परिश्रमी, ईमानदार, लगनशील, हमेशा नेपथ्य में ही रहता है। फ्रंट पर नहीं दिखता। वह चेहरा नहीं बनता। जब को प्रगति और जीत के लिए सारा जीवन एक कर देता है।

सोचता हूं! 

क्या वह केवल  

“अपने लिए काम करती है,” 

यह खरा सच है, 

वह अपना ही काम करती है

अपने काम ही से आखिर! 

वह,भी जिंदा तो रहती है।


पर हरा पेड़ 

जो लहलहाता है ऊपर🌲

देखा है, कभी! उसका भी! 

वही नग्न भग्न!  

जड़ ही! तो, पोषण करती है! 


विशिष्टता क्या है?  

इन विन विन संबंधों की! 

दोनो में द्वंद नहीं!  समन्वय है! 

सहयोग है, 

ऊंचे लेवल का आपसी विश्वास है।


पेड़ नीचे ऑक्सीजन देता है,

जड़ों तक,

जड़ें उसे पोषण देती हैं 

ऊपर गले तक।

इसीलिए दोनों खुश है,

आपसी सपोर्ट से खिलते हैं।

पर: जब कभी जड़ों को 

ऊपर से समुचित ऑक्सीजन 

नही मिलती, वे मर जाती हैं।

फिर क्या होता है, ध्यान रहे!  

कितना भी विशाल पौधा हो 

जमीं ऊपर, सूखना ही पड़ता है।

मर कर, जड़ें से मिलना ही पड़ता है। 

तब सहयोग नहीं, 

द्वंद पनपता है

सुनो, मानव तब 

हंसता नहीं, रोता है।


अब आप बिलकुल 

ठीक समझ रहे हैं! 

आज सभी देशों में…. 

आम जनता जड़ों की तरह, 

देश में फैली हुई है, हर जगह

गहराइयों में, 

अपनी तन्हाइयों में

चुपचाप, अकेली, अनदेखी 

बे आवाज, लगातार, 

शर्मसार! होकर, 

नितांत जरूरी ऑक्सीजन

और जरूरतों से महरूम,

काली रातों के कटने का 

क्षण क्षण इंतजार करती, 

जीती ….और मरती।

कहने को तो वो,

अपने आशियानो में बैठ 

अपना काम करती,

रोज की रोजी कमाती, 

जैसे तैसे, जो कुछ मिले

खाती, पीती, जीती, पर! 

कल के अच्छे दिनों का 

कहीं न कहीं, बेसब्री से 

इंतजार भी करती।

समय असमय, रोग बीमारी,

अपनी मौत मरती।


ऑक्सीजन, जीने के लिए

कुछ तो चाहिए,

जब बिल्कुल नहीं मिलती, 

बस, यहीं से सहयोग के अभाव में

द्वंद पनपता है, 

और जड़ रूपी जनता! 

खाद तो बनती है

पर उसे ऑक्सीजन नहीं मिलता।

और जब 

जड़ मरती है तब.....

बाहर का हरा भरा पेड़ सूखता है।


पर ये जो नेताओं, नौकर शाहों

धनपतियों, बाहुबलियों, पत्रकारों

व्यापारियों, दलालों, व्यवस्थापकों,

जिम्मेदारों की भारी, फौज देखते हैं! 

यही है हरी हरी फसल 

लहलहाती है ऊपर! 

तुम जड़ों के बल पर! 

कभी सोचा है!  

इनकी खाद कहां से आती है! 

तुम सारे गरीब!  

जो कुछ भी! कहीं भी!  

कैसे भी! खरीदते! खाते! पहनते! 

दवाई कराते, फीस भरते! 

जीने मरने पर प्रमाण पत्र बनवाते! 

सब कुछ पर!  

अपने पसीने से महकता 

अच्छा खासा टैक्स भरते हो, 

और पुलिस से लेकर

हर दरवाजे पर 

जहां भी जाते हो

तय शुदा रिश्वत भी अदा करते हो।


तुम एक सौ अड़तीस करोड़ 

इन शेष दो करोड़ लोगो को 

जिंदा, नहीं! लहलहाता 

हरा भरा रखते हो।


तुम्हीं लोग जिंदा रह कर 

इन मुर्दा लोगों की खाद 

रोज रोज बनते हो।

इनकी कैपिलरी 

बूंद बूंद तुम्हे नित 

सुबह से शाम चूसती रहती है, 

और वही रस धार बन 

इन्हें सींचती रहती है।


ये लाल चेहरे, 

मुस्कुराती आंखे

मधुर बैना, 

शांत, धैर्यवान दिखते लोग 

सारे संत, साधु, 

रागी, बैरागी, सन्यासी

तुम्हारे ही 

खून पसीने से पलते हैं।

तुम्हीं ने 

इन सबके घरों, 

महलों, शौके हयात, 

ऐशखानो, इबादत खानों को

को मजबूत आधार 

तुम्हारी अपनी छत का ही है, 

जरा ध्यान से देखो! 

तुम इनपर नहीं 

ये तुम पर जिंदा हैं।

इतना ही नहीं आज के सारे 

आधुनिक व्यापार इंटर नेट, 

गूगल, फेसबुक, इंस्टाग्राम

सब तुम पर ही 

अपने फैलाए 

जाल से ही

जिंदा हैं।

कभी बैठो और सोचो! 

दुनियां के अंदर झांक कर देखो।

जय प्रकाश मिश्र


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