आप लोगो की ही तो तलाश रहती है!

पुष्पांजलि: पुष्प प्रथम

अच्छा हुआ! अच्छा हुआ!  

आज कुछ, एक बार!  

फिर अच्छा हुआ।

ए..क बच्चा! 

बहुत छो..टा! 

सड़क पर चलता हुआ,

मेरे देखते, ही देखते

उम्मीद से लंबा हुआ।

छोटा खिलौना प्यार का

बाजार लेकर 

आ गया था।

देखकर कुछ बेबसों को 

देता हुआ, 

ताली बजाता,

खुश हुआ।

अच्छा हुआ, अच्छा हुआ

आज फिर एक बार, कुछ अच्छा हुआ।

भाव: जब हम अपना लालच छोड़ते हैं, उससे आगे बढ़ते हैं तब ही बड़प्पन के अधिकारी होते हैं। यही सुगंध है जो पुष्प और अच्छे लोग फैलाते रहते हैं।

पुष्पांजलि: पुष्प द्वितीय

ए..क चिड़िया, 

पू..छती है ?  

जाने क्या मुझसे! 

कर, पीठ पीछे 

बैठता हूं, 

जब मैं उसके।

बहुत धीमे 

प्यार से।


क्या! 

छोड़ जाऊं!  

इन सभी को, आज मैं

तेरे भरोसे!  

घर में तेरे लान के 

आज ही पैदा हुए हैं

देख तो! मेरे ये बच्चे! 


बैठा हुआ हूं,

मूक बन कर

सोचता!  

उसके 

परों 

में 

बस रहे

शत रंजिनी सौंदर्य को 

काश! उसको छू मैं पाता! 

तृप्त हो उसमे समाता! 


वह पूछती है, 

प्रश्न अपना, बार कितने! 

सोचती है भूख को, प्यास को,

उस नवल शिशु के।

आतुर खड़ी है, द्वार अपने! 

पूछती वह! बार कितने! 


और

मैं डूबा हुआ, 

बैठा वहीं 

चुप पड़ा हूं, मृतक सा 

पर सोचता हूं,

वो कहां..है, मैं... कहां हूं।

इस सृष्टि के निर्माण में।

भाव: नारी लाखों गुना पुरुष से महिमावान होती है। वह प्रेम और करुणा का यथार्थ ही नहीं उसके फल को भी अपने ऊपर लगने देती है, पोषण करती है, महान है। वही तो इस नित्य नवीन सृष्टि का रूप है। पुरुष सौंदर्य की कल्पना शीलता का पान करता है, इसीलिए उसमे प्रेम, करुणा, ममता की मात्र छाया मोती के लावण्य जैसे ऊपर से छलकती दिखती है। नारी में संबंधों की गहराई है पुरुष में हल्कापन, छिछलापन कहीं न कहीं विकल्प की पृष्ठभूमि में रहता ही है।

पुष्पांजलि: पुष्प तृतीय

बहुत है आसान लिखना, 
भेजना खत, 
बांचना भी है सरल है, 
मुंह बोलना, सबसे अधिक।
पर! 
समझना, 
सुनना कठिन है
खत नहीं, कुछ शब्द हैं 
वेमेरे लिए! 
बस  "मेरे लिए"
"किसी और के" मेरे लिए।
आखिरी... वे! 

जाने न 
कितने शब्द 
जो बोले गए थे
आज तक उसके लिए।
सोचे हुए थे, अभी तक, उसके लिए।

टूटती, 
मेरी प्रार्थना की, 
बीड हैं ये, अंश है
फर्श पर फाड़े हुए 
फेंके हुए।

पुष्पांजलि: पुष्प चतुर्थ

कौन है जो झांकता है 
आंख से तेरे
यहां...., 
भीतर मेरे!  
कुछ खोजता... है? 
ढूंढता है क्या?  यहां... 
क्या? यहां! 
"कुछ कुछ" छिपा है।
सोचता है! 
तो गलत है! यहां सच है।
यही सच है।
भाव: सपनों के झूले सपनो में ही होते हैं।
कोई भी भावना करने के पूर्व यथार्थ और सच का सामना करने को तैयार रहना चाहिए। यह दुनियां केवल ताजे हरे फूलों का हार नहीं, उसका भार भी है।

पुष्पांजलि: पुष्प पंचम 

आज की कविता (साठ.. पार)

कुछ नितांत निजी बातें

कभी कभी, लिखनी 

अच्छी लगती हैं।

शायद ये लाइने, 

सुकू दे जाएं 

भरम में जीते 

आदमी को

किसी! 


इसलिए सुनो! 

हे! सभी साठ पार!


हां, अब 

इस उम्र में 

ना जाने क्यों! 

मेरे वही, मुझे अभी, 

नए, नए लगते 

कपड़े, जल्दी, जल्दी 

पुराने से, होने लगे हैं।

हां, वही जो इतने दिनो से संभाल आलमारी में रखे थे, सजाकर,

फटे तो 

अब भी नहीं; पर

मोड़ों पर, 

रखे रखे, शायद, 

मोड़ों की भाषा समझ 

तीखी चुभन से

इतने जल्दी, घिस घिस के 

वहीं से फटने तो नहीं 

लोगों की तरह, अब 

दूर से, आए दिन

कटने लगे हैं।


देखते ही देखते 

उनके

कफ, कालरों, बाजुओं

मोड़ों ऊपर, 

अनचाहे रेशे से निकल आए हैं।

बाकी सब कुछ, पूरा… कपड़ा

अभी तो बिलकुल 

मजबूत! 

यार ये 

बिन 

बुलाए 

कुछ मेहमान

अपने आप, ऐसे क्यूं

अपने आप, आने लगे हैं।


कितना कुछ बाकी है, 

अभी इन में! 

खींच खींच के देखता हूं,

फिर गहरे बैठकर… 

सोचता हूं।

”अब ऐसे अच्छे कपड़े, कहां मिलते हैं”

उन्हें भीतरी आंखो से देखता 

पिछली…यादों में डूबता 

खोता हूं।


वो… दिन!  

जब पहली बार…! 

पहना था, इसे

डूब जाता हूं… कहीं,

फिर धीरे, बहुत धीरे… 

सरकते सिल्क नहीं, सैंड सा 

बाहर आता हूं।

अब थोड़ा!  बड़ा.. लगता है! 

लेकिन कोई बात नहीं!  

पहनूंगा..!  

मेरी निष्ठा अब इसमें 

पहले से ज्यादा घनी

हो गई है: उसमें।


आज जो पहना था! 

वो कपड़ा था, 

लोगो के लिए कपड़ा होगा; 

मेरे लिए तो 

मेरी तब से…

अब तक की…

”जिंदगी होने की” ड्रेस है वह!  


इसलिए, आज भी,

बड़े प्रेम से धुलता हूं, 

प्रेस करता हूं,

तह लगा, लगा, शो केश में 

सेल्फ पर रख ले-ता हूं।

पहनूंगा, 

किसी खास दिन! फिर

सोच में ही सही,

एक बार खुश होता हूं।


कुछ अपनी तरह 

जैसे अब घर पर ही रहता हूं।

बस खास जरूरत पर, 

बुलावों पर, किसी,

कभी कभी ही 

निकलता हूं।


फिर बैठे ही बैठे 

कपड़े हों या आदमी 

उन सबके

रिटायरमेंट का

रिव्यू करता हूं।


आखिरी के दिन 

चाहे शर्ट के हों 

या अपने जिंदगी के, 

तहों में

शो केस में ही गुजरते हैं।

अपने ही लोग 

और चीजों के ही, साथ साथ

हमें भी

धो पोंछ सुखा, घरों के

किसी कोनों में 

सुरक्षित रख देते हैं।


उम्र के साथ 

हर चीज में

आखिर! एक दिन

रेशे निकलते ही हैं,

यह सच है, ठीक भी है।

वैसे ही जैसे 

समय के साथ 

मन के सपनों में 

कभी के, बुने 

धरोंदों में, ये रेशे 

एक एक कर धीरे धीरे

टूट टूट, अलग होते बिखरते हैं।

हम कुछ भी करने लायक

तब कहां बचते हैं।

एक बात कहूं! 

मुझे कुछ, एक से लगे,

अपने ये कपड़े 

और मैं।

वैसे तुम कुछ भी कहो।


सुनो? 

एक दिन बिना काम!  

निकल पड़ा!  

घूमा दिनभर! 

कभी इधर!  कभी उधर! 

तभी, एक सूनी गली में अंदर 

एक दर्जी, बहुत बूढ़ा 

मिला मुझको, काफी भीतर।

वह भी गजब था! 

बिना काम के भी चश्मा लगाए,

बैठा दिनभर था।


कुछ शर्ट्स ले गया था,

उलटवाने फटी कालर! 

और कुछ पाजमे कुछ पैंट्स 

घुटनों पर दरकते हुए, सोचा! 

हाफ करवा लूंगा इन्हे 

एक बार और फटने, 

या कहो फेंकने से पहले

कुछ दिन तो पहन लूंगा।


पुराने कपड़े हों, या यार..

इन्हें छोड़ते, दिल दुखता.. है,

बहुत लंबा वक्त गुजारा है

इनके साथ..., 

इसलिए इन्ही में.. आज भी 

सच कहूं! पूरा.. मन रमता है।


चलो ‘एक काम मिला’ 

मुझको और उसको।

पर मैं 

क्यों इतना!  खुश हुआ! 

उस दिन 

समझ नहीं पाया, 

आज तक इसको।

अगर कोई जानता हो तो 

जरूर बताए, फोन कर मुझको।


हां हां वो बदलेगा 

मेरी काफ, 

मेरी कालर बहुत बेहतर,

पुराना आदमी है!  

तजुर्बा जरूर होगा! 

खुश हुआ,

नई हो जाएंगी, मेरी कमीजे!  

कुछ दिन और साथ रहना होगा

पुराने अतीत के साथ

फिर से! सुंदर, एक बार! 


मुझे पास आया देख कर

न जाने वो, 

क्यों इतना खुश हुआ, 

उसे इतना खुश देख मैं तो 

अचकचा गया! 

पुरानी धुएंठी 

चिपचिपी नम आंखों

में गौर से देखता मुझको,

बोला,... 

अब नए लोग, नए बच्चे, 

कपड़े कहां सिलवाते हैं,

आप से सच कहूं यही कफ कालर बदल

हम भी अपना काम चलाते हैं।

इसीलिए आप लोगो की ही 

तो तलाश रहती है!  

हम उम्र हो, थोड़ा बैठोगे

कुछ अपनी कहोगे, 

थोड़ा मेरी भी तो सुनोगे।


कोई आए,

तसल्ली से मिले,

बात करे, 

मेरे पास बैठे,

बिना किसी मतलब 

आए दिन, 

घंटो.. घंटो..

मेरा इंतजार करे।

जब धीमे धीमे आता दिखूं, 

खुश हो, उठ उठ कर,

दिल से इस्तकबाल करे।

कुछ पूछे! कुछ बताए! 

कुछ, बिना बोले

मेरा हाल!  समझ जाए!  

अब तो इतनी ही है जिंदगी

यही है, जिंदगी!  

बस यही तो! है जिंदगी।


जय प्रकाश मिश्र








Comments

Popular posts from this blog

मेरी, छोटी… सी, बेटी बड़ी हो गई.. जब वो.. पर्दे से

पेंशन बिन जिंदगी, मेरी ये खाली हो गई है।

चलो पेरिस की एक शाम से मिलें!