खिलने की आस लिए हर सुबह लथपथ खड़ी थी।
जिंदगी! गजब थी!
घटनाओं से, पटी,
अपनी, समझ से बड़ी,
बदलती, निर्णयों को
पूर्व के, छोड़ती,
कूदती.. आगे
बढ़ती रही।
झूठे! सूखे!
साख के पन्नों में!
कुलबुलाती!
नीचे दबी।
कल के करारे,
गुलाबी, हरे,
डाली के पेजों पर
खिलने की आस लिए
हर सुबह लथपथ!
खड़ी!
मुझे तो मिलती रही।
मुझे क्या देती!
जाता कहां! लेकर उसे!
मैं सोचता हूं!
जब जब तिरा हूं!
धार पर!
बहती हुई,
इस दरिया ऊपर
बहते समय की।
स्मृति में आज भी
कल को लिए मैं बह रहा हूं।
कल के सुनहले
सपने बुनता
काल के इस जाल में
खुद फंस रहा हूं।
छोड़ता तट को बराबर
पार्श्व को भी,
मैं निरंतर
हूं कहां!
छोड़ता मैं जा रहा हूं!
या छूटता सब जा रहा है?
सत्य क्या है! खोजता हूं!
पूछता हूं, मैं, खुद ही… से;
क्या यही… हो! तुम!
तुम! जिंदगी… हो?
कौन हो? तुम…!
जो जिंदगी बन… घूमते हो!
क्या तुम, वही वह!
”आदि” हो!
जो आज भी हो!
कल भी रहोगे!
इस अनश्वर अंत तक!
बोलते क्यों हो नहीं?
तुम शक्ति हो!
उस प्यार की?
जो थामता है, थामे हुए है,
सृष्टि को! ब्रह्मांड को!
चर चराचर, को अनव-रत,
गतिमान रहकर
लय विलय संग उदय होते
डूबते ब्रह्मांड में !
इस व्योम में चिर काल से।
कौन हो तुम?
क्या? तुम भी! जुड़े हो
उसी से...
जिससे... जुड़ा है, विश्व सारा!
एक ही जो केंद्र, सबका
प्रेम ही जिसका किनारा।
बंद हैं सारे उसी में
घटना क्रमों का खेल करते!
देखता हूं!
बुद्धि पैदा, तर्क पैदा, हो गए है
इसलिए हम इस तरह
एक दूसरे से बंट गए हैं।
खेल सारा "स्मृति है"
इन जंगलों में एषणा का,
प्रेरणा का प्राण भरकर,
उछल कर कर बुद्धि भरती,
गिरती उछलती,
लहर सी बहते हुए इस
समय नद में, इठल करती
आगे बढ़ती।
प्यार की
उद्दाम बढ़ती भावना!
जब राग बन कर घूमती है
इस जगत में,
धुर अंधेरे रास्तों को लांघती
वह घुनघुनाते "घुन" बनी है
आज इस परिपक्व जग में।
प्यार जब
सीमित हुआ,
तब दुख दिया।
है यही वह बीज
बोना था हमें अपने घरों में
फैलता जब घर से बाहर
कलियां लिए यह, फूलता
मह-महाता सबका तन मन, झूमता।
रख लिया चालाक बन कर
जब से हमने, झोलियों में
बंद कर कर,
राग बन कर
जहर बन बन
डंस रहा है
हम सभी को।
बस स्वार्थ की दुनियां बनाई, हम सभी ने
दूर खुद से हो गए हैं हम, तभी से।
जय प्रकाश मिश्र
वास्तविक सांसारिक जीवन को परिभाषित करती आप की यह रचना अत्यंत सराहनीय है🙏🙏🙏🙏🙏सादर प्रणाम
ReplyDelete