प्रथम पुष्प: खुद्दारी
आवरण ओढ़े हुए
वह आज...भी
वैसे.. खड़ा था,
वह ही, बड़प्पन आज भी
उसमे भरा.... था।
हंसता तो... था,
पर मुस्कुराता,
खुलकर... नहीं था।
कलियों से गुलाबी
होठ उसके, टसर से
कोनों पे,
मसकते दीखते थे,
हल्के से ऊपर
उठते हुए
अच्छे साकरों से
जुड़ते वहीं थे।
वे होठ, थे या
चटकती कलियां गुलाबी
शर्म से थे लाल
कुछ भीगे हुए से।
व्यथित होता,
लटकता था
नहीं चेहरा कभी,
बस रमक जाता,
कोमलता लिए, ताजा कमल
घटते पानी दर्मयां
नीचे झुक जाता था।
द्वितीय पुष्प: लिपि बद्धता क्यों
कुछ नितांत बातें निजी,
कभी कभी, लिखनी
अच्छी लगती हैं।
शायद ये लाइने,
सुकून दे जाएं
भरम में जीते
आदमी को
किसी!
तृतीय पुष्प: आखिरी के दिन
आखिरी के दिन
चाहे शर्ट के हों
या अपने जिंदगी के,
तहों में
शो केस में ही गुजरते हैं।
अपने ही लोग
और चीजों के ही साथ साथ
हमें भी
धो पोंछ, घरों में
सुरक्षित रख देते हैं।
चतुर्थ पुष्प: अपने लोग
पुराने कपड़े हों या यार
इन्हें छोड़ते दिल दुखता है,
बहुत लंबा वक्त गुजारा है
इनके साथ,
इसलिए इन्ही में
आज भी मन रमता है।
पंचम पुष्प: जिंदगी
कोई बात करे,
अपने पास बैठे,
बिना किसी मतलब के
इंतजार करे,
घंटो घंटो।
यही है जिंदगी,
बस यही तो है जिंदगी।
षष्टम पुष्प: पिघलता है अहम जब
पिघलता है
अहम जब यह
भीगता हूं हृदय तक अब,
दीवार काली
जो खड़ी थी बीच में
मेरे.. सभी के
दीवार बन कर चाइना की
घट रही.. है।
गलने लगी.. है
मोम सी..,
समझ की
उठती लवों से..
गर्म होकर
देखता हूं.. आज यह
चुपचाप ही बहने लगी.. है।
देखना!
उस पार भी
इस पार के संग!
आज कुछ संभव हुआ है।
देखता हूं रंग
चश्मे का नहीं नंबर
बदलता जा रहा है।
अहम की उस चमक में,
क्या बहुत कुछ था!
हां! वापसी हर बात की करना
प्रमुख था।
दीखता मुझको कहां था,
रंग उसकी आकृति कुछ।
प्रतिकार ही प्रतिकार मेरा
लक्ष्य था।
बन के छोटा देखता हूं,
आंख सा,
दुनियां को सारी
मूल से
उस शिखर तक...
सरलता से अब चढ़ रहा हूं।
थी नहीं तब स्वीकृति!
कुछ भी कहे वो!
मैं भरा था नाक तक!
मैं क्या करूं!
आज खाली मैं हुआ है
जगह कितनी बन गई है,
फैल कितना मैं गया हूं
क्या कहूं।
बह रही
यमुना का, काला रंग
जो था,
धुल-धुला भागीरथी में
आज निर्मल चांदनी से
मिल रहा है।
कुछ कड़ा,
छिदने लगा है, भीतर मेरे!
नारियल की खोपड़ी सा टूटता!
मृदुल रस, महका हुआ
भीतर समाया आज
अपने पा रहा हूं।
बर्फ की रंगत लिए,
हृदय की दीवार सा
कोमल मुलायम!
शीतल गरी की फांक सा
शुभ्र अंतस्थल मेरा,
आज खिलते खेलते उस
बाल शिशु सा
एक सा सबके लिए
अब हो रहा है।
आ समाती
हैं सदाएं
प्यार से भेजी गई जो,
आज मुझमें....
दर्द दिल में
दूसरों का भी
अब समाता.... जा रहा है।
प्यार नाटक
ही नहीं,
दुनियां में सारी
सत्य भी है
आज कुछ कुछ
समझ मेरे आ रहा है।
प्रवंचना, अविश्वास का,
वह भाव जो था
आज तक भीतर समाया,
मार ठोकर दूर करता था
सभी को
राज करता था अकेला।
प्रेम करुणा का
सुकोमल पुष्प देखो
आंगन में मेरे खिल रहा
भर रहा है गंध
अपनी हर तरफ
मैं भर गया हूं आज इससे।
जय प्रकाश मिश्र
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