आखिर! दुनियां क्या है।

शीर्षक: प्रकृति सबकी मां 

प्रीति का 

प्रतिबिंब वह!  

सुंदर! नहीं थी! 

मन मोहती मेरा, 

वो, मेरी मां नहीं थी।

प्रकृति थी, 

वह, रच गई थी

हृदय की गहराइयों में

बस गई थी।

वह मां की, मां थी, 

प्रेम का संस्पर्श थी,

आनंद की जननी, 

नियति को

गर्भ में 

ले घूमती थी।

भाव:  प्रकृति वास्तविक मां तो नहीं पर सभी माताओं की भी मां है। इसमें साक्षात रूप तो नहीं पर अपरिमित प्रेम, केयर और सादगी मिश्रित सुंदरता छिपी हुई है। यह नियति या घटनाक्रमों को उदारस्थ किए रहती है।

शीर्षक: सारे जीवन एक से 

मजबूर था, वह

जा नहीं पाता,

किसी के घर तक तलक वो ।

लोग आते, 

थे समाते, उसी में।

और! 

और फिर क्या! 

देखते ही देखते! 

एक हो जाते, 

उसी में।

सभी के कष्ट दुख पीड़ा

तकलीफें समेटे पास

कैसा आदमी था! 

वह बहुत खुश था।


तुम कुछ भी 

कहो, 

वो जितना

मजबूर था, 

उससे ज्यादा 

मजबूत भी था, 

कौन था बराबरी में 

उसके!  

सभी छोटे, अदने 

सच में 

आधे पौने।

पर! उसका

दिल बड़ा था, 

वह, आज भी 

अपने उसी बड़प्पन पर 

वैसे ही फिदा था।


सामर्थ्य! किसकी! 

उसके जैसी! 

गरजता? 

नहीं गुरगुराता था,

ताकत बेमिसाल!  

चौबीस घंटे में 

एक बार,

लोगो से, मिलने आता था।

यार! क्या कहूं! 

जिस शान से आता, 

उसी अदा से, 

मस्ती में, जो कुछ संग लाता,

उसे वहीं, 

उसी हाल में छोड़ 

चला जाता था।


समय! समय का पाबंद

वैसा मैने, नहीं देखा।

अरे! वह सागर था

ज्वार पर, चांद 

देख चढ़ता

भाटे सा 

उतर

जाता

था। 

आम लोगो की तरह 

जब तब नहीं! 

वह खास 

था, 

तभी तो

बिन मांगे, खारा होने पर भी

मीठा पानी दिन रात 

नद, नाले ला ला

पर्वत शिखरों

का उसके

पैरों पर

चढ़ाते 

नही थकते थे।

लगता था वो सागर था।


महिमा थी उसकी।

रत्न, मोती, जाने क्या क्या! 

बेतरतीब भरे, बिखरे थे।

खजानों में उसके, 

जो भी इनका हिसाब लगाता, 

छोटा पड़ जाता था।

उसके महल में हाथी

इन हाथियों से भी

विशाल,बहुत

बड़े थे।

वैसे 

जीव जंतु

धरती पर! नहीं नहीं! 

किसी लोक में नहीं थे।

सोचता हूं क्या वो सागर था! 


कुछ भी हो, 

उसपे, सबकुछ, रहा हो,

तो भी, वो, मुक्त नहीं था! 

हम सभी की तरह! सबकुछ के बाद! 

आखिर! हमीं जैसा!  

वह भी तो 

मनुज 

था! 


चिंताएं कितनी होंगी!  

सोचो! रात दिन! 

बेकल! अनरेस्ट में रहता था।

विचार और रूढ़ियों का 

संघर्ष सतत कितना 

चलता होगा, 

चौबीस घंटे सातों दिन

बेचैन हांफता रहता था।


उसकी 

भी मां थी, 

उसे प्रेम करती थी।

अपनी गहराइयों से उसकी

गर्म जल धाराओं के पीछे पीछे

शीतल, ठंडी जल धारा ले ले दौड़ती थी।

लेकिन स्वभाव किसी का भी हो

बदलता कहां है, जल जाती है

रस्सी, ऐंठन मिटती कहां है।

मां बेटे का ये खेल

सोचता हूं क्या है! 

या इसी में छिपा

वह आनंद है

जो हर मां 

बाप 

बूढ़े होने

पर, याद कर 

मगन हो खुश होते रहते हैं

कभी अपने तो कभी भगवान की

बाल लीला का श्रवण करते हैं।

आखिर! दुनियां क्या है।

जय प्रकाश मिश्र



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