मन नहीं लगता कहीं! मैं क्या करूं!

प्रथम पुष्पांजलि:  मेरा देश

देश है यह, 

पर एक है यह! 

बांधता है कौन इसको 

किसलिए! 

कुछ अलग है, 

यह आज भी क्या? 

अन्य से! 

आत्मा इसकी कहां है?  

खोजता हूं! 


कितने लोग, 

कितनी सोच! 

कितनी चाहतें, 

कितनी ख्वाइशें! 

कितने, कितने भरे, और कितने 

कितने खाली! 

एक एक चीज के

एक एक बात के हजारों सवाली! 

कोई अंदर से काटे, कोई बाहर

कोई दीमक बन चाटे रात, रात भर

फिर भी खड़ा है, अड़ा है 

आखिर! किसके भरोसे

अपना ये देश,

सोचता हूं! 


हिमालय! अपनी जगह से 

आज तक नहीं हिला है,

नीचे सागर! अभी भी 

उतना ही  हरा भरा है।

मरुस्थल दाहिने, आज भी 

वैसा ही उजड़ा, उजड़ा पड़ा है,

जंगल बाएं, पहले से ज्यादा 

ही कुछ घना घना हुआ है।

फिर अपना देश 

कमजोर कहां है? 

शायद बीच में! 

आपस में लोगों के! 

पर देश बीच में, मजबूत हो सकता है।

सुरक्षित भी जरूर रहेगा,

बस हमारे भीतर,

अर्थात इसके बीच में

छेद और दरारें न आने पाएं।

यही सोचता, कामना करता हूं।

द्वितीय पुष्पांजलि: आम जनता

दुख कितने बिखरे हैं यहां

इतनों को.. कैसे सहलाऊं,

दुख में भीगे, दुख ही पहने

दुख ही लादे... आते जाते

कितने हैं तुमको बतलाऊं। 


नित फिरते ये.. मारे मारे, 

तुम... देखो तो सारे सारे

जैसी सुबहा थी शाम हुई

इनकी तो उम्र तमाम हुई।


आंखे दुखती, वाणी दुखती

सांसे भी… दुख ही ढोती हैं

अरे! कैसे कहां पकड़ूं इनको

मेरे हाथ…दुखों में सनते हैं।

तृतीय पुष्पांजलि:  देश प्रेम

छोड़कर जब से गया हूं!  

दर ये तेरा! 

मन नहीं लगता कहीं!  

मैं क्या करूं! 

देवता! मेरा वहीं!

बैठा हुआ है! आज तक! 

हिल नहीं पाता वो, दर से! 

तूं ही बता!  

मैं क्या करूं! 

भाव: जो देश से बाहर हैं उनसे, जिनसे यहां की माटी छूट गई उनसे, अपना देश कितना अच्छा होता है यह पूछे कभी। यहां जैसी स्वतंत्रता, मस्ती, सुविधा, विविधता कहीं नहीं मिलती। देश वह देवता होता है जो अपने नागरिकों के हृदय में बसता है। पर देश, कहीं और नही जा सकता। यह अपनी सीमाओं में सदा किसी देवता सा थान में कैद रहता है।

चतुर्थ पुष्पांजलि: 

परदे सा चल रहा था सब
मेरी नजर के सामने
चुपचाप, भीगता रहा 
मैं खड़ा अपने सामने।
धंसता गया 
दलदल में मैं 
अपने बनाए रास्ते
छोटा हुआ,
या
बड़ा कितना!   
खड़ा हूं!  
खुद के सामने! 
भाव:  हम अपनी जिंदगी को अपने निर्णय और अपनी पसंद से जब जीते हैं और अपनी पुरानी संस्कृति को विरासत को छोड़ देते हैं तो उसके परिणामों के लिए भी हमे जिम्मेदारी लेनी चाहिए। अपना आकलन जरूर करते रहना चाहिए की गहरे दल दल में न फंस जाएं नए रास्ते ऊपर ले तो जाते दिखते है नीचे उससे जल्दी उतार देते हैं।

पंचम पुष्पांजलि: 

बन रही हर रेख उसकी

लरजती.. यह देह सुंदर,

बरसतीं ये.... बदलियां,

घुमड़ते ये... मेघ मनहर।


रजत दीपित शिखर अद्भुत

चमकती... ये.... पहाड़ियां।

कोकिला.... का कंठ.. यह,

मृदु मधुर... रस भीगा हुआ।

है कहीं मधुमास 
छितरा 
क्या यहीं पर! 
विकल मन  
क्यों हुआ जाता 
देखकर! 
यह सोच कर सब! 

जय प्रकाश मिश्र



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