मैं उडूं, बन मदिर तितली फूल के आयास में।।
हे झीन संसृति के सुरभि
हे मूक भाषा... के फलक
हे दीनता के.. नम्र नायक
एक बार मुझको दरस दो।
भाव: नित्य के आवागमन से सृजित और लय होती इस दुनियां में नित्य रूप हे ईश्वर! बिना वाणी के, बिना बोले ही, सबकी सुधि लेने वाले, हे दीन दुखी और असहाय के आश्रय रूप नायक, मुझे भी अपनी अनुभूति कराओ।
करता प्रनय तुमको सहज,
तुम सत्य हो.., विश्वास हो।
इस विश्व के.... आधार हो।
मेरे.. तो.... पालन हार हो।
भाव: मैं अच्छी तरह जानता हूं, सुन चुका हूं आप सत्य और विश्वास के प्रतिरूप हैं उसके रक्षक हैं अतः प्रणत हो अपने हृदय से आप की स्तुति करता हूं। आप ही विश्व के आधार हैं आप ही सबके पालनहार भी हैं।
चट्टान से जब फेंकता
निर्भय, अभय,
निज रक्त को
नीचे अतल के पाश में
पेंग्विन तेरे ही आसरे।
भाव: पेंग्विन अपने बच्चे को उड़ना सिखाने के लिए उसे अर्थात अपने खून को, रक्त को ऊंची पहाड़ी पर ले जाकर नीचे कठोर भूमि चट्टान पर जानबूझ कर गिरा देता है। ईश्वर पर उसका अविचल विश्वास रहता है की उस बच्चे के पर यानी पखने काम करेंगे और वह नीचे कठोर चट्टान से टकराने के पूर्व जीवन की प्रथम उड़ान भर कर बच जाएगा। और उसका डर हो या मृत्यु भय या प्रभुकृपा वह हमेशा बच ही जाता है।
उड़ जाएगा!
उड़.. जाएगा!
मर नहीं यह पाएगा!
उड़ गया…, लो उड़ गया!
नवशिशु था, देखो… उड़ गया!
सत्य में विश्वास… का
लो दरस फिर…से मिल गया।
भाव: हम जानते हैं की पेंग्विन हो या कोई भी पंछी ईश्वर पर विश्वास कर ही अपने नवजात शिशु को अपने घोंसले से जन्म के बाद, जब प्रथम बार धक्का देकर नीचे गिराता है, और नीचे कठोर चट्टान, या कठोर भूमि होती है तो वह किसके ऊपर भरोसा कर ऐसा करता होगा वह आप ही होंगे। और हर चिड़िया का बच्चा घोंसले से निकलते ही या हर पेंग्विन गिरते ही हवा में उड़ने लगता है। अतः मैं भी आपदा में अपने कार्य के साथ उसी पर विश्वास करूं! यह उदाहरण सच्चा है।
थी भावना विश्वास की,
"वो हर जगह हर रूप में"
है एक ही फैला हुआ,
यह सोचता लटका हुआ…,
वह डाल से…,
एक कीट था…।
रेशम बनाना था उसे,
पर मन में लिए कुछ और था।
मैं उडूं,
बन मदिर तितली
फूल के…. आयास में,
विश्वास लेकर,
मगन भीतर,
सोचता रात दिन में।
गुनगुनाता था हमेशा
गीत वह विश्वास का,
दीनता में दिन गुजारे
भक्त ज्यों भगवान का।
भाव: सतत प्रार्थना और आत्म समर्पण तथा पूर्ण विश्वास फलित होता ही है ऐसा हम अन्य उदाहरण से भी पाते हैं। निश्चय ही एक इल्ली (रेशम बनाने का कीड़ा) जो शहतूत की डाल से लटका हुआ जब मन में ठान लेता है की उसे तितली बनना है तो उसकी अटूट श्रद्धा एक दिन उसके आत्म विश्वास को पूर्ण करती है।
लो विप्लवी उस शक्ति ने
गहरे अंधेरे खोल को।
फाड़ कर, दो फाड कर,
सुंदर नवेली सृष्टि का
इजाद कर,
उस कीट में
नवरूप सुंदर रंग भरकर,
पंख देकर
उस अंधेरी रात का ही अंत,
मानो कर दिया।
कैसी रुपहली सुबह देकर,
सृष्टि के कौमार्य रूपी
पुष्प को उपहार देकर।
कह दिया
मुक्त विहरो इस धरा पर,
नित्य विचरो इस धरा पर।
भाव: सतत लगन और अटूट विश्वास का फल उस इल्ली को मिलता है वह एक सुंदर तितली बन जाती है। उसका कठोर कवच टूट जाता है और वह फूलों का पराग भी चखती है। यह भगवत कृपा ही है।
तितलिका तुम रूप हो
उस सत्य में विश्वास का।
है अखिल खिलता जहां
इस क्षितिज के विस्तार का।
देखकर यह सब लगा,
तुमने दिया है दरस अपना।
इसलिए मैं धारता इस
सत्य को विश्वास को
अपने हृदय के अंतरों में।
भाव: हे सुंदर तितली तुम ईश्वरीय विश्वास और अविरल लगन का प्रतिरूप हो। निश्चय ही इस उदाहरण से ईश्वर की प्रेमाभक्ति भी बढ़ेगी। और लोग प्रभु पर अपनी आस्था बनाए रखेंगे।
जय प्रकाश मिश्र
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