यह सत्य है, विश्वास पक्का यहां तो सचमुच उसी का वास है।
किसी
बनफसे की...
महक से.. मह मह
महकती,
वह जमीं रहे, जिस जमीं पर
साथ मिलजुल
घर बसाएं
प्यार का हम
जिंदगी में।
भाव: जहां भी कोई दंपति रहें वह जगह पुष्पवती सुखमय और खुशबू धारण करे यह मंगल कामना करता हूं।
निर्भीक नय की मुस्कुराहट
बीच तुझको,
ढूंढ पाऊं, देख पाऊं!
वज्र के उस घोष में।
निकटता तेरी
मुझे महसूस हो,
विस्रस्त आंचल प्रकृति के
खेलूं ....कभी
जब कहीं एकांत में।
भाव: प्रार्थना है कि हे ईश्वर! तेरा संस्पर्श मुझे हर स्थिति में मिले। तेरा छुपा रूप हम निडर मुस्कुराहट, क्रोधित व्यक्ति में और बर्बर में और दुर्दांत समस्याओं में भी भीतर महसूस कर पाएं। तेरा अजेय राज्य ही हमे प्रकृति के नग्न फैले अस्त-व्यस्त सौंदर्य में भी एक समान अनुभव हो।
आग के
अंगार में
जो, चमकता है, रस भरा यह!
शांति!
जो.. सरिता के रस में
डूबती सी बह रही है,
विकल मन तुझे ढूंढता है
दुधिया हंसी के पार्श्व में क्यूं?
भाव: ईश्वर हर सौंदर्य में समान रूप से स्थित है चाहे वह आग का तरल स्वर्ण सा अंगार हो या नदी के पास बहती सौम्य शांति! या छल कपट विहीन बच्चों की दूधिया हंसी! सबमें वह अपने विविध रूप में दर्शनीय है।
कैशोर्य के कौमार्य की
यह स्निग्धता! मिश्रित लुनाई!
देखकर इसको
तेरी उस
रूपसी सी याद आई।
भाव: हे शक्ति! जब भी हम निसर्ग सौंदर्य दर्शन करते हैं चाहे वह किशोर या किशोरी का लावण्यमय छलकता कौमार्य हो या लुनाई यानी अद्भुत प्यार मिश्रित सुकुमारता और स्निग्धता यानी तैलीय सरकता, मधुर स्पर्श सबमें तुझे ही पाते हैं।
है विधाता ने दिया
निज रूप का
वरदान खुलकर।
नेत्र में जादू छुअन सा,
स्पर्श में अंतर गमन।
हो सत्य तुम,
एकबार फिर से देखता हूं।
सोचता हूं!
पर देखकर! मुझको
नई, यह
कली खिलती
इस तरह क्यों, मुस्कुराई,
चुप खड़ा हूं! देखकर यह।
भाव: ईश्वर की शक्ति निराली है! उसकी सौंदर्य प्रियता सारी सृष्टि के निर्माण में अर्थात लोगो, चिड़ियों, वनस्पतियों में फैली पड़ी है। कितनी सुंदर है उसकी कृति उसने कैसी जादुई आंखे बनाई है, किसी प्रिय के स्पर्श मात्र से हम भीतर से खिल जाते हैं ये क्या उसकी जादूगरी से कम है। इन सबमें उसका सत चिद आनंद का सत्य साफ दिखता है। फिर सामने की नन्ही कली के भीतर से वही ईश्वर की आंख मुझे चिढ़ाती सी लगी।
है कहीं
बजने लगी लो
करुण रस की रागिनी,
है कहीं कोई साधु बैठा
पास में मुझको लगा,
लेकर सुधा की सारंगी
मैं खोजता हूं।
भाव: कितनी मस्त दुनियां बनाई है उसने धन्यवाद है उसका! देखो न कैसे कैसे लोग बनाए हैं कोई को साधु, कोई को फकीर बनाया उनकी बातें और उनके स्वर, गान, सारंगी की आवाज कितनी कर्ण प्रिय सुधा वर्षण करती होती है।
हे जिंदगी के सच!
कहां तू खो गया है।
ढूंढता तुमको
कहां मैं आ गया हूं।
देवदारी इस पवन के पाश में
कौन है! जिसने मुझे बंदी बनाया।
बांज़, अंयार, बुरुंश की खुशबू वहां से!
कौन है जो पास मेरे आज
इतनी दूर लाया।
भाव: जब साधक की प्रार्थनाएं रंग लाती हैं और वह सिद्ध बन जाता है तो हमारे विस्मय की दुनियां का निर्माण वह बैठे बैठे कर देता है। दूर की चीजे पास आ जाती हैं कुछ भी अप्राप्य नहीं बचता। वह स्पर्श से वाणी से हमें रोग मुक्त शोक मुक्त कर देता है।
भोजपत्रों की महक,
मुझको बताती।
आ गया मैं
सत्य के उस देश में,
मलिन मन तन छूट जाते
पथ में जिसके,
सारा अहम, सारा भरम,
सामर्थ्य का वह विगुल
विगलित बह गया होगा कहीं
उस विकराल के आकार में।
भाव: जब ईश्वर भक्ति अपने उनवान पर आती है तो हम अपनी इच्छाएं भूल जाते है, सारे गर्व, घमंड, अहम का नाश हो जाता है। उसके विपुल समृद्ध साम्राज्य को अनुभूति की आंखों देखकर हम अपनी न्यूनता पर शर्मिंदा हो जाते हैं। सारी दुनियावी गंदगी धुल जाती है व्यक्ति निर्मल चंद्र हो जाता है।
यह चमचमाती
चांदनी का मुकुट पहने,
महमहाती
इन समीरों की शरीरों संग रहने,
धवलिमा के राज्य में
रहने विचरने।
कौन है
जो आर्द्रता के रस नहाना
चाहता है।
यह सत्य है, विश्वास पक्का,
अब तो मेरा
यहां तो....
सचमुच उसी... का वास है।
भाव: एक स्थिति ऐसी आती है जब हम प्रार्थना और समर्पण से ईश्वर में सम्व्याप, ईश्वरमय हो जाते हैं। सत्य दिखने लगता है अर्थात हम और वह नियंता दो नही एक ही है, विश्वास उस पर पक्का हो जाता है दुनियां फीकी लगती है। उसके अपरिमित वैभव के साम्राज्य में आने जाने को हम स्वतंत्र हो जाते हैं।
जय प्रकाश मिश्र
मुझे यह जान पड़ता(लगता)है कि कविता के अन्तिम पंक्ति मे समस्त सार जीवन का है। वही है, सार सेवा है।भक्तिके साथ, सांसारिक वस्तु , व्यक्ति,पदार्थ, सब उन्मय है। आना-जाना कुछ नही। सादर 🙏🙏🙏🙏🙏प्रणाम
ReplyDelete