बड़ी मछली है न! छोटी का इतना खयाल नहीं रखती।
लोग जाते हैं,
आते हैं,
एक दूसरों के घर,
देखो न!
कितना! बहल जाता है मन!
बस आपस में
कुछ... देर,
मिलकर...!
भाव: अपने मित्रों सुहृदों से मिल उनके घर आ, जा हम अच्छा महसूस करते हैं। मन कैसा भी हो आपस में बात कर एक बार बहल तो जाता ही हैं।
एक बार...! फिर से...
तरो-ताजा.. हो लेते हैं,
कुछ.., उनकी सुन,
कुछ... अपनी कह,
तकलीफें..,इरादे..,
उम्मीदें.., मुरादें..।
भाव: अपनी अपनी समस्याएं आपस में साझा कर और सुख दुख की बातें कर हम हल्के हो जाते हैं।
बस थोड़ी देर के लिए
भूल जाते... हैं,
सबकुछ...
समस्याओं का दबाव,
जो, था, फटने को तैयार,
बह..... जाता है,
शांति से... सुरक्षित बाहर...।
केवल अपनो के साथ..
मिलजुल.., घुल.. मिल,
बैठ, बातें... कर।
भाव: अनेकों जीवन की बातें जो हमे एकांत में मथती रहती हैं, भीतर तनाव बनाए रखती हैं चाहे संबंधों की हों या आर्थिक हों आपस में बात करने से बाहर निकल कमजोर हो जाती है। और हम रिलैक्स महसूस करते हैं।
पर,
यह सब
अपनों और
अपने जैसों के
बीच ही, होता.... है।
जहां
झरने को
अपनी लय में
झरने का पूरा..... मौका
मिलता... है।
संकोच हीन..,
मान सम्मान विहीन..
अपनौठा!
आज कल... जल्दी
कहां.. मिलता है।
भाव: जहां हम अपनी श्रेणी के लोगों के बीच जहां हम सामाजिक और नकली बेड़ियां हटा सकते हैं और प्रेम स्नेह से मिल बैठते हैं वही अपनी सारी बातें बिना लाग लपेट सीधी सच्ची कर सकते हैं। जहां मान सम्मान और हेठी का भाव न हो अपनापा होता है वहां स्थिरता, और शांति मिलती है।यद्यपि ऐसे लोग कम ही होते हैं।
छोटा आदमी
बड़े, घर जाकर...
स्वभाव में बह
बोल.. नहीं सकता।
वह सोचता.. है, तौलता.. है
बोलने से पहले..,
जाने न कितने... दरवाजे
एक एक कर लगाता.., खोलता.. है।
वह! बह नहीं सकता! वहां,
रिसता है,
पिसता है,
विचारों में घिसता है।
अपने से बड़े
तब कोई अदनी सी बात
अपने बड़े को
मुश्किल से.. कहता है।
उसकी छोटी.. बात वहां
मायने नहीं.. रखती,
बड़ी मछली है न..!
छोटी मछली का
इतना
खयाल.. नहीं रखती..।
भाव: बड़े लोग अपने अभिमान से भरे होते हैं वे अपने बॉस या और बड़े को तो सुनते हैं पर अपने से छोटों की बात पर विश्वास नहीं करते। जबकि छोटा आदमी बड़े काटछांट कर तौल कर कम ही बोलता है। बोलने से पहले उसके असर को अपने भीतर अनेक बार सोचता है
यह फर्क छोटा नहीं,
बड़ा... होता है!
अपने से छोटे की.. बात
जरूरत मंद की.. बात
पीड़ित की.. बात
अपनेपन से
सुनना.., ही
आपके लिए
कुछ नहीं,
उसको दिली तसल्ली.. देता है।
भाव: किसी परेशान हाल, दुखी, समस्याग्रस्त की बात को धीरज से अच्छे से सुनना उसके लिए बड़ी बात होती है। कभी उसकी समस्या को छोटा समझ दुत्कारना नहीं चाहिए। अनेक बार काम होने से बड़ा अपने साथ हुआ व्यवहार ज्यादा मायने रखता है।
मान... और क्या है, किसी का,
कोई आए, तो, खुश होना।
उसे अपनापा मिले ऐसी
कोशिश करना।
थोड़ा समय
देना,
धीरज से.. सुनना
उसको वेटेज... देना।
कुछ कर पाएं तो अच्छा...
नहीं तो.., ईश्वर का भरोसा.. देना।
छोटा हो गर तो
विश्वास भरना..
उत्साहित करना..
पास बैठा कुछ.. बातें करना,
उसके लिए,
और चीजों से बड़ा होता है।
भाव: किसी के भी लिए उसका मान सम्मान क्या हो सकता है शायद वह जहां जाए, जिससे मिले उसे पा लोग खुश हों, उसकी बात को तवज्जो दें उसे अपनापन मिले, उसे लोग अपना कुछ समय दें। और यदि मिलने वाला अपने से छोटा हो तो उससे प्यार से बैठा बात कर उत्साहित करना यही तो है अच्छाई।
पर
असली
समस्या यहां नहीं...,
वास्तव में कहीं और है।
छोटे के तो साथी, हेली मेली
बहुतेरे सही,
बड़ों का तो अपना सच्चा साथी
एक भी नहीं,
वह तो सबका सिरमौर है।
अब तुम ही सोचो
सागर
कहां जाए!
किससे मिलने!
किससे कहे!
नीचा बने!
अपनी बात
कौन है जो उसकी सुने!
इज्जत बेइज्जत में
कसी,
अपने में ही बुरी तरह
फंसी,
उसकी जिंदगी,
इस मामले में बद से, बदतर है।
अपने भीतर अनेकों
ज्वार भाटा जोरों का लिए
वह रोज रोज जीता है
जीवन के सारे सुख दुख
अपने सीने में दफन करता
अपनी सांस के
धागों से उसे रोज रोज सिलता है।
इसी लिए हम जैसे ज्यादा
उसके जैसे कम हैं।
जय प्रकाश मिश्र
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