सींचता है, सुरसरी के अंगरस से,

सब देखते हैं, 

आंखें उसकी 

उठ रही हैं,

'झील पट' सी

गहरी...

चमकती

नील मणि.. सी 

स्वच्छ, हिय में... समसती हैं।


कोई फलक.. शीतल 

बिछाती जा... रही हैं, 

जिस भूमि पर वो... 

प्यार से बस... देखती

नत हो... रही हैं।


एक सागर 

मूक..., 

रसमय..., 

लहलहाता,

छंदबंधित, तरल होकर, 

लहर मंथर, साथ लेकर,

बह रहा, सौंदर्य बनकर 

साथ ही, खुद में समाता।


प्यास का 

झरना लिए 

छलनामयी वह! 

करुण, करुणा 

अंक भरकर

पग, पग

बढ़ाती 

बढ़

चली है।


झिलमिलाती 

तुहिन कनिका घेर कर

उसको चलीं हैं 

शीर्ष धारित

चमचमाते पर्वतों की 

चोटियों पर, 

बस रहे

उत्तुंग द्युतिमय 

हिम किरीटों 

के शिखर पर।


बरसता है

नम्र सावन, हर 

पदों पर मदरता,

मुस्कुराता,

हिलकता है।

हृदय प्रेमिल, अनुभूतता है

पड रहे, पद्क्षेप, के संग, 

हृदय पर ही 

पांव रख, 

कोई नवल शिशु चल रहा है।


देखता हूं 

बंध गया हूं 

पाश से मैं!  

क्या हुआ मुझको!  

खड़ा मैं सोचता हूं! 

धन्य है यह, या विधाता! 

जिसने रचा है रूप ऐसा!  

चुप खड़ा स्तब्ध! 

मैं गुप चुप खड़ा हूं।


नील तंद्रिल आंख में 

यह शांति गहरी…! 

सोखती… हैं 

सोच… मेरे 

मात्र मन की!  

या सकल जग 

सोच से बाहर हुआ है! 

तिरछी, आड़ी भ्रम सुनिर्मित

समय की बगिया से उत्थित

जो मुखर मुझको किए

संग घूमतीं थीं,

बिपलवी सब! 

शांत कैसे हो गई है! 

देखकर इस भव्यता की मूर्ति को! 

लग रहा है बहुत पीछे, चुक, गई है।


सौंदर्य है यह आह!  कैसा! 

सींचता है, सुरसरी के

अंगरस से!  

भीगता अंतस

मेरा संग आत्मन के।

थकित तन में 

हरिल मन ले

बिभ्रमी के साथ यह

जग नम्र होकर घूमता हूं।

जय प्रकाश मिश्र

भाव: दैवीय सौंदर्य का आलोक दिव्यता और विपुल आनंद आत्मतः धारित करता है। सुख, प्रसन्नता, शांति, धीरता उसका सन्नद्ध गुण हैं। निरा दैवीय सौंदर्य अभेद रूप से नैसर्गिक आनंद ही होता है। उसे पाकर, नेत्रों से देख हम सुख और आनंद जो एक साथ अन्यत्र सामान्यतः नहीं मिलते, उस अगाध अतल सागर में चेतना को ले डूब जाते हैं। दुनियावी बस्तुएं और आराम उसके आगे हीन लगता है। इसके दर्शन से आत्मतुष्टि अपनी पराकाष्ठा पाता है। और व्यक्ति जीवन में उपराम हो विनम्रता प्राप्त कर लेता है। सबसे महत्व पूर्ण इस परा सौंदर्य को देखने के लिए लौकिक आंखों के साथ मन की, अंतस की दृष्टि, भावना भी तृप्त होती है।

जय प्रकाश मिश्र

आप ने अगर पढ़ा हो तो जरूर बताएं आपको कैसा लगा आप क्या कुछ सुधार किसी स्तर पर चाहते है।

द्वितीय पुष्प

झर रही है 
शाम से बदली 
क्यूं ऐसे! 
बादलों ने 
आज ऐसा 
क्या किया है? 

भीगते पर, 
पंछियों के, कह रहे है,
सोच तूं, एकबार!
रात, अंधियारे
ये बादल, 
क्या करेंगे।

रिस रहीं है, 
आज बूंदे,
बादलों से, ....क्यूं यहीं? 
क्यूं यहीं, 
डेरा जमाया...बादलों ने ? 

पाती* कहाँ हैं, रोक पाती,     *(पत्तियां)
झमकती, बरसात को तब, 
जब झम, झमाझम 
बरसता हो,
हो, मगन, अविराम अविरल 
पागल ये बादल।

बह गया मन, साथ उसके,
हाय बरबस! 
बन अपरवश! 
पांव क्यों कर बढ़ चले 
उस ओर मेरे।
मैं कहाँ पर 
रह गया हूं!  
क्या कहूँ।
बस बह रहा हूं 
बरसती इस धार के संग।

क्यूं छुपा है, 
ठंडा झोंका, 
आंचलों के बीच मेरे,
साथ ले जाने को इतना, 
क्यूं तुला है, पवन नटखट।

बादलों संग, ये बदलियां
क्यूं घुमड़ती, पास मेरे! 
क्यूँ अमन सा मन हुआ है! 
आज मेरा! 

क्यों चमन बिखरा है इतना
क्यों घटाएं घिर रहीं हैं रात में इस।

निकल आये...  
दूर... कितनी, दूर तुमसे...,
नजदीकियों से.. हाय! 
डर  लगने लगा है।
बारीकियों से, 
तुम मुझे... 
इतना न.. देखो 
चुभ रही.... तेरी निगाहें..... 
नश्तरों.... सी। 

धूप कितनी भी कड़ी थी 
नर्म चाहत से तो कम थी 
दूरियां कितनी... रही हो
पायदानों से तो कम थी।

दिन थे.. कैसे, शामे... कैसी
मचलता बस ख्वाब था तब
ख्वाब.... भी रेशम... सरीखे
फिसलते.... थे, सरकते..तब।

क्या  है, बदला,
मैं वही, तुम भी वही, 
ये दिन वही, सूरज वही
दरिया वही, धरती वही।
तो फिर उड़ाने.... क्यूं नहीं 
भरता है ये दिल... 
आज, उतना! 
 
लौट आता है, 
सिमट कर 
बैठ जाता है, 
थके पक्षी के जैसा।
सांस गहरी, चुक गया हो! 
थकित होता!  
पास मेरे गुनगुनाता।
हाय! पर मैं सोचता हूं, 
ऊंचा तो उड़ता!  टूट गिरता! 
बिखर जाता!  
पर साथ होता इस धरा के।

इस जिंदगी से
गिर... यहां 
एक बार फिर से
उस ऊंची 
ऊंचाई से निपट
सौ बार गिर के।
इस धरा पर रेंग जाता! 

बह तो जाती 
जिंदगी एक बार खुद से,
बंद, जो सैलाब है 
सदियों का भीतर
निकल बाहर 
बह तो जाता।  

एक बार ही सही।
नजदीक से 
मैं जिंदगी को देख पाता।
गिर के बिखर जाने से 
या फिसल के 
गिर जाने में जो डर है न! 
एक बच्चे से बूढ़े के बीच तक
बर्दास्त कब तक करूं।
उम्र कितनी बची है!  
पास तेरे देख तो।
क्या यहां का डर 
यही...
मन में लिए ही 
उस ग्रह की अपनी यात्रा 
भी शुरू करूं।

जय प्रकाश मिश्र


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