नर हो तुम! दृढ़ बनो!

मुक्तक: 01

तूं इधर उधर का, न जिक्र, कर
मेरे गुजर बसर कि न फिक्र कर,
अपनी सुना तूं है किस… कदर
तेरे रह गुजर कि है मुझे. खबर।

मुक्तक:  02

बीता हुआ बसंत था तूं
पतझड़ थी तेरी. काया,
शिशिर ही सांसे थी तेरी
बरसात में क्यूं.. आया।

मुक्तक: 03

कंट्रास्ट न हो तो 
जिंदगी… क्या है? 
सादी! सच्ची! उबाऊ सी! 
कुछ तो चाहिए 
जो बहते पानी में भी दिखे! 
सतह पर ऊपर, 
थोड़ा भीतर 
या नीचे! 
पर, पानी से, अलग 
रंग, ढंग, चितवन 
कुछ कुछ बांकी लिए।

आज की कविता

नर हो तुम! 
न कि, कीट हो,
दृढ़ बनो!
धीरज धरो, 
संकल्प लो!

बुलबुले ये 
मन के तेरे! 
घेरते तुमको, 
घनेरे! 
डूबते, ले साथ में,
गहराइयों की
तलछटों में। 

आगोश में
अपमान भरकर,
राग का संसार, 
रच कर,
पीब के 
कीड़े, सदृश ये,
कुलबुलाते 
हैं, बुलाते 
पाप के उन 
रास्तों पर
इंद्रियों को 
साथ लेकर,
मन को तेरे।

बच तूं इनसे,
आज ही से।
विषय रस 
मीठा बहुत है,
मधुर है,
पर तीखा बहुत है,
इस सड़न से 
दूर रह तूं।
अपनी सारी
जिंदगी में।

गिर गया 
इनमे, अगर 
एक बार! 
तो फिर सोच!  
फिर से
निकलना बेहद 
कठिन है,
पाप के इन 
लिस-लिसाते 
चंगुलों से।
प्रायश्चित! 
भी भूल जा 
एक बार फिर से।

मलिन मन को 
मोड़ अब तूं, 
जोड़ उसको 
चेतना से,
जड़ नहीं.. 
संवेद्य है तूं! 
व्याप्त है 
हर एक घट में।

चेतना ही अंश है, 
उस दिव्य का,
तुम हठ करो, 
इस मदिर मन से।
डूबा हुआ जो 
विषय रस में,
सच कोढ़ का 
यह घाव है
तेरे गले तक।
त्याग कर 
मन इंद्रियों का
चेतना के साथ रह कर।
चेतना जो व्याप्त है सर्वस्व में।
ध्यान कर उस चेतना का
आज ही से।

भाग्य क्या है?  
ईश क्या है? 
सोचता हूं!  
हाय अपना!
संयमित यह 
"ध्यान" 
जो हमने 'चुना' है
पद पटों      (प्रतिदिन चलते और चढ़ते)
जीवन में चलकर 
हर एक तल पर।

देखकर और
घोल कर इस 
सकल जग को 
अनुभवों में,
फिर छानकर 
बीनकर अपने करो से
अपने दृगो में साध ली है।
ढाल कर 
उस शील में 
चादर बनी है 
तन की अपने,
आचरण व्यवहार बनकर। 
जिसमे समोया खुद को हमने।
शायद यही है भाग्य 
अपना ईश 
अपना द्वार उस तक
पहुंचने का
बहुत हद तक।

जय प्रकाश मिश्र

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