सुबहै झर जैहैं, सकल फुलवा।
रा..धा तूं.. द्युति दामिनी
म..न भा...वनी,
म...न
संको..च
समा..... इ,
मृग.. शा..वक
जिमि..
त..रल मन
वि..रमति
इ..त उ..त धा..इ ।
श्री राधा जी 'श्री युक्त' सौंदर्य माधुरी स्वरूप हैं। एक दिन अपनी 'श्रीमोहिनीरूप' में बाल मृगी सी इधर उधर विहार कर रही थीं।
तेहि अवसर कान्हा... तंह
प्रगटेउ. बन..., वन..मा..लि,
मोर मुकुट त्रि-भं..गिमा
शो..भा बर.नि... न जा..इ।
उसी समय "श्याम-सखा बिहारी जी" श्रीकृष्ण जी अचानक उनके सामने अपने मोहन स्वरूप में त्रिभंगिमा सहित मोर मुकुट धारण किए प्रगट हो गए।
रा..जति कर..,
कर.. किं..करी
वं.शी... हो...ठ लज़ा...इ।
तिलक.. भा..ल मय, के..श, मुख
निरखति राधा आइ।
बिहारी जी के हाथों में बांसुरी जो उनकी दासी है उनके कहने में रहती है, श्रीकृष्ण अधरोष्ठ स्पर्श के प्रारंभ काल में अचानक राधाजी को देख लजा गई। राधा जी बिहारी जी के भाल अंकित तिलक, घुंघराले केश, सुंदर मुख को आश्चर्य से तन्मय हो देख रही हैं।
गहन घटा, पूनम सहित,
पवन लेइ उडि जाहिं।
स्वेद ललाट, कनक द्युति,
हीरकनी सम भाति।
राधा मुख अधखिल कमल
डूबत श्री मुख जाइ।
हृद गति मनमानी भई,
लोकलाज़ बिसराइ।
कर माला गहि नहि परै,
उर, मेली हर्षाइ।
भक्तन सुधि, तन मन गई
जब युगलमूर्ति मुसुकाइ।
भाव: मित्रों उस समय धूप छैयां का खेल बादलों और मरूत अर्थात पवन ने मिल कर आकाश में खेला हर ओर आनंद हो गया। श्री राधे कृष्ण के बिहार से उनके मुखमंडल पर स्वेद कण पारदर्शी मणियों से सुंदर लगते हैं। श्री राधे का मुख अधखिला पुष्प सा श्री हरि के पूर्ण विकसित नील कमल से सुंदर मुख पर झुका हुआ है। इस परमानंद में ईश्वर और भक्त सभी आनंद सागर में लोकलाज बिस्मृत कर आसांभवता में डूब गए। मां राधे के हाथों से पुष्पमाल छलकते हुए प्रभु के गले में पड़ जाता है। यह अवरणीय माया के आवरण से मुक्त श्री राधे कृष्ण की बिमल निष्पाप मुस्कान देखकर भक्त जन आकंठ प्रमुदित है।
।। जय जय श्री राधेकृष्ण।। मातृ बंदना के पद।
जय प्रकाश मिश्र
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