कैसे कैसे! बाजार बनाए हमने!
यार अपना भी
ये वक्ते-दयार,
कैसा गुजरा!
इन दिनों,
देखो न!
कैसे कैसे!
बाजार सजाए हमने!
दुकानें लगा दीं शिक्षा की
देखो तो, आम चौराहों पर!
कैसी, कैसी मिल कर सबने!
डिग्री! जो, जो चाहे!
फीस भर, भरे
बिना पढ़े, ले ले।
सहूर!
सऊर भी बेचते हैं, हम!
आज कुछ ऐसी ही
दुकानों पर,
खास! खास! बैनर तले।
तौल कर! देते हैं वे,
जिसका जितने में
काम चले,
वह, उतना ले ले।
संस्कार!
संस्कार तो…
कपड़े सा….
नाप कर.. बेंचता है वह..!
काट काट के
साइज में सिल देता.. हैं।
जब जिसे
जिस रंग का चाहे,
बस कुछ पैसा लेता है,
पल भर में गाउन सा
ऊपर से पहना देता हैं।
नमूने!
नमूने सबके, इन लोगों ने
शानदार, जानदार, दुकानों पर
अहा! कैसे सजा रखे हैं।
कितने शान से, करीने से!
देखो तो शर्म आए,
न देखो तो हया जाए।
इश्तेहार तो देखो, इनका
बस नाम लिखवा दो,
किसी भी पप्पू का
इनके यहां,
प्लेसमेंट पक्का! समझो!
गिरे से गिरा नबाब जादा
भी लाखो की
नौकरी पाए।
दो रंग में ही समेट दी
सारी दुनियां… इन ने,
दिखा के इनको… ही
विद्वान बनाया सबको।
(मात्र काले सफेद अक्षर पढ़ लोग योग्य बन रहे )
खुली किताब ये कायनाती,
इतने बड़े जहां की, यारों,
बंद हो गई आज,
देखो न इनके चार पन्नों में।
मानता ही नहीं,
कोई चीज इनकी
किताब बाहर है,
क्या करामात है!
कुछ वर्ग फुट में ही
घुसा दी ये पूरी
कायनात इसने!
बांध दी सीमाएं
तेरे हंसने की
तेरे रोने की ही
नही बिलखने तक की।
हृदय फट जाय तेरा,
वाकया से किसी
इनको क्या!
इनके लिए
इंसल्ट शब्द ही काफी है अभी।
जय प्रकाश मिश्र
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