है वही कारण सुनो इस सृष्टि का।
उसने,
साफ की
वह जगह,
थोड़ा नम किया,
चार दाने बो दिए,
और चल दिया।
एक सलोना,
पेड़ निकला,
कुछ ही दिनो में,
पत्तियों संग, फूल आए,
मधुमक्खियों ने रस लिया।
छत्ता बनाया, मधु पिया,
और चल दिया।
फल लगे,
चिड़िया हंसी
पकने लगे, पीले हुए
मिठास भर, झरने लगे
छक छक गई, चिड़िया वहां की।
पेट अपना भर लिया,
और चल दिया।
लौट कर वो
फिर से आया
बीज जो,
बोकर गया था।
पेड़ पर अब,
फल लगे थे,
फल भी काफी,
पक चुके थे।
तोड़ कर सब, घर गया,
खुश हुआ, दावत किया।
और फिर
वह चल दिया।
मैने देखा
खेल सारा,
हाथ जोड़ा!
इस धरा को,
बादलों को,
इस हवा को,
तप रहे उस सूर्य को,
बरसी हुई, हर बूंद को।
बस
और क्या ? मैं चल दिया!
सोचता हूं!
कौन पीछे रह गया?
आखिर ये सारा क्यों हुआ!
है वही, वही है,
कारण सुनो इस सृष्टि का।
वह चिन्मयी थी,
रह गई, हर बार
जिसने सब किया।
जय प्रकाश मिश्र
टूटा हुआ वो बांध:
टूटे हुए इस बांध को
जब देखता हूं;
बिलखती, रोती हुई
इस बालिका को सोचता हूं।
बह गए मां बाप जिसके
बिन बताए, कुछ कहे!
संताप इसका क्या कहूं!
अभिशाप इसका क्या कहूं!
इस भयंकर बरसती,
फुतकारती वर्षात् में
घनघटा के बीच घिरती
इस अंधेरी रात में।
है कहां अब घर!
नहीं! कुछ भी
नहीं अब है बचा !
बस यही है पेड़!
पाकड़ का
पकड़,
जिसको वह खड़ी है।
सुबह से,
घूरती आंखे लिए।
जाने न किसको कोसती है।
बह गया घर बार सब
अपने पराए,
पाल रखे थे सभी
छोटे बड़े
दो चार पाए। (चिड़ियां और जानवर)
आंख कैसे बुझ रही है
शाम जैसे ढल रही है।
बस नहीं आगे लिखूंगा
आप पर सब छोड़ दूंगा।
अभी कितने दिन हुए हैं
सब सलीके से बना था,
तब शांति थी, चहुंओर
जल बिलकुल नहीं था।
सब सोच कर,
उसने बनाया
अपने लिए, (ठेकेदार व्यवस्था गठजोड़)
सबके लिए। (नैतिक जिम्मेदारी)
तब सभी खुश थे।
बांध से इस,
सोच कर अब सुख मिलेगा।
कौन गलती कर गया।
विश्वास सबका हर गया।
किसको कहूं,
मैं ही तो हूं!
वह
मैं ही तो हूं।
अब क्या करूं!
चल आज से मैं जो करूं
अच्छा करूं, सच्चा करूं।
जय प्रकाश मिश्र
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