आज खुद को ढूंढता हूं।

एक 

अनकही 

सी दास्तां 

अंदर मेरे

अब तक 

बची थी? 

सोचता हूं!  

द्वंद की 

यह तिरमुहानी 

खड़ी,  

तब से,  

आज तक, 

कैसे पड़ी थी।


मीठी भी है!  

सुरसरी सी! 

जब जब है बहती,

रव में, अपनी

सटके मुझसे, 

नजदीक से 

अच्छी भी लगतीं।


मछलियां नटखट 

कहां से प्रगट 

होतीं, उछलतीं,

चमकतीं हैं 

घन अंधेरे

जुगनूओं सी।


तारों सरिस, 

चुप शांत नभ में, 

टिमटिमाती, 

कुनमुनी सी 

ताकतीं हैं।


फिर साफ दिखती,

थोड़ा दिपतीं

लय विलय का खेल करतीं, 

फुदकती हैं।


सो गईं थीं, 

जाने न कबसे, 

खो गईं थीं,

संसार की इस दौड़ में

मोड़ के किसी छोर में

छूट कर पीछे, 

कहीं 

गुम हो गईं थीं।


रसभरी 

हों चाहे जितनी! 

जिंदगी से दूर 

सच! यह हो गईं थीं! 


पर अब 

समझ आया 

कि यह रसभरी सरिता 

इतने दिनों से यहीं क्यों ?

अपने बगल में बह रही थी।


आज जब खाली हुआ मैं! 

मिलना हुआ फिर जिंदगी से! 

ये अचानक याद आईं! 

मुफ्त की बरसात लाईं।

भीगने की लालसा 

भीतर कहीं से 

उमड़ आई।


ये, आज क्यों,

ऐसे हैं बहतीं! 

बहती नहीं थीं, 

पहले जैसी! 

क्या सबक! 

कोई है बाकी! 

जिंदगी का! 

बैठकर मैं सोचता हूं! 


उम्र के इस 

तिरमुहानी मोड़ पर,

घर बार से भी

दिल ये अपना तोड़ कर।

आगे बढ़ा.... था।


पर, ये अचानक 

क्या हुआ! 

सुख-दुखी मन 

में द्वंद भरकर 

आज क्यों ऐसा लगा? 


उम्र तो 

पूरी लबालब 

भर गई है।

सफेद चादर

चांदी ही बनकर 

सिर पे मेरे 

चढ़ गई है।


मुक्त यह मन 

उर्ध्वता के 

रास्तों पर 

चल रहा था।

व्यक्ति बंदित 

प्रेम से हट

दिव्यता के 

पट उतर कर

प्रेम की सच्ची कहानी 

जीवनों में लिख रहा था।


पर अचानक 

क्या हुआ, 

रंग गाढ़े, हो गए।

मेरी नजर बदल गई 

या मैं, 

किसी से बदल गया! 

सब, साफ, क्यों, 

दिखने लगा! 

मैं खुश हुआ, 

अब क्या कहूं?  

तुम सोच लो 

कैसा लगा!  

मेरे ख्वाब ही बदल गए,

मेरी निगाह भी बदल गई।

सब खेल ही बदल गए।

देखते ही देखते 

मेरा रास्ता बदल गया।


दोस्तों की तलाश में

मत पूछ!  

मैने क्या किया? 

तुम सोच लो 

तो सोच लो; 

हां कुछ और नीचे 

सोच लो।

सच कहूं,  

सब देखकर!  

मेरा हृदय पिघल गया।

मैं वापसी की गुहार करता 

घूमता हूं, रात दिन

वही पुरानी जिंदगी 

मैं खोजता हूं, रात दिन।

जिंदगी में डूबकर…

जिंदगी को खोजता हूं, 

आज खुद को ढूंढता हूं। 

शांति केवल ढूंढता हूं।


जय प्रकाश मिश्र

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