तुहिन कणों की बेटी, गंगा कहां से लाऊं।

अस्तित्व क्यों है ? 

इस जगत का! 

सोचते हैं! 

घूमना क्या नियति है! 

ब्रह्मांड की! 

जीव की, 

हर चीज की, 

जो दीखती है, 

इस जगत में

घूमती है, सतत क्रम में,

बांधी हुई इस

अक्ष पर ब्रह्मांड की।


जगत में

जो कुछ..जहां है, 

हम उसे.... 

"कुछ" जानते हैं।

पर नहीं हम जानते हैं! 

'वह कुछ बड़ा, उस जगह पर है'

उस सोच से, .... हम सोचते हैं।


"अंश” है, 

वह,

बह रही... 

उस महानद... का,

बह रही जो... आदि से 

अब तक बराबर...।

सृष्टि को  'पद' बांधकर     (पैर में पायल सी)

यह नृत्य करती, पैंजनी सी

पैर में अपने निरंतर।


वह एक कंकड़ 

जो पड़ा है

उस जगह पर, 

घुप अंधेरे! 

अंश है, नींव है, 

शुरुआत है,

बनते हुए, किसी 

हिमालय का, 

भविष्य में, 

तूं मान तो।


सोच से 

अपने परे है, 

राज उसका।

वह क्षुद्र है 

तेरे लिए, 

बेकार हम 

सबके लिए। 

पर, उसकी, जरूरत! 

”उसको” है! 

तूं समझ भी तो! 


अस्तित्व का आधार है वो!

नींव का पत्थर है वो! 

भविष्य के 

बनने का कांटा 

उसी पर तो है टिका, 

कुछ सोच भी तो।


सोचते हैं, 

रहस्य क्या इस विश्व का है ? 

तो ध्यान दें, संयम करें 

परिवर्तनों पर, 

सतत हम

साधन करें,

यही तो है रास्ता,

उस मूल का।


चलो सब कुछ 

शून्य कर लो 

अब नहीं है... 

शक्ति कोई,

कहीं भी।

मृत, मिट्टी बची है, 

शेष।

सूरज बुझ गया है,

सृष्टि में अंधेर है। 

कणों के भीतर नहीं है, 

बंध, आकर्षण कोई अब

देख तो, सब 

चुर मुर हुआ है।

रुक गई सारी हवा,

जम गया, सागर महान,

चेतना से शून्य! 

यह जग हो गया है।


है नहीं कोई वस्तु, 

कोई जीव

वनस्पतियां यहां पर।

रंग सारे खत्म होकर 

उन सूर्य में ही मिल गए।

आकर्षण धरा का शून्य है

भार सबका खो गया है।

ब्रह्मांड भी सब गिर रहा है

टूट कर सब बिखरता है,

एक में सब मिल रहा है।

रुक गया, कुछ, 

गिर गया, कुछ, 

आपस में आकर, मिल गया कुछ। 

टूट कर सब बह गया

देखते ही देखते 

ब्रह्मांड खाली हो गया।

आकाश तो था मुक्त

यह चुप चुप खड़ा है।

शांति है चंहुओर 

पानी खो गया है।

तो अंतिम बचेगा क्या? 

गहन चिरशांति!  सकल गतिहीनता! 

घनंधेरा चारों तरफ, असीमित ठंड! 

पर यहां ऐसा नहीं है,

है यहां पर शक्ति कोई

जो संभाले खड़ी है 

आकाश के संग

विश्व की इस व्यवस्था को।

आभार हम उसका करें,

वह मातृ है, चिनमई है! 

उत्पन्न करती

पालती, और 

बड़ा करती है सभी को।

है यही, वह शक्ति, 

है वही, यह शक्ति।

इसलिए ब्रह्मांड अब तक चल रहा।

भाव: इस विश्व में जो हो रहा है, और जो भी प्राणी कर्म कर रहे हैं, वह नियति के लाखो वर्ष बाद की जरूरत का भाग है। इस कारण हर व्यक्ति, हर विचार, हर क्षुद्र भी उस विशाल संश्लिष्ट चेतना के लिए सम्मान प्रद है। सभी के सारे प्रयास और उपलब्धि उसी महान यात्रा का हिस्सा है। अपने को किन्ही भी परिस्थिति में हीन या त्याज्य न महसूस करे। आप उस महान की इच्छा और जरूरत का अति महत्वपूर्ण अंग हैं। आप ही उसकी धुरी भी हैं।

द्वितीय पुष्प

क्यों चुक जाते हैं? 
ये बड़े बड़े दिग्गज! 
कुछ दिनों बाद
चलते, चलते, 
अकारण 
अपने आप।

कोई कोई तो 
सागर के
ज्वार से 
दौड़ते, चढ़ते, 
धकेलते आते हैं।
समाज और 
सिस्टम को! 

फिर 
देखते ही देखते 
कुछ ही दिनों में
लौटते, 
पीछे भागते 
भाटे से गुम हो जाते हैं
इस विशाल सागर में 
चुपके चुपके! 

पर भागते भागते भी 
ये गंदे लोग, 
लोगो के 
आम रास्तों पर
अजीब, लिसलिसा 
घिनौना कीचड़ सा 
फेंक जाते हैं।

आम आदमी 
इसी कीचड़ में
बार बार 
फिसलता, गिरता
उठता, संभालता
इन महान 
दिग्गज लोगो 
की तरह ही
हाथ पे सरसों 
उग आने वाली
सफलता की 
उम्मीद करता, 
जिंदगी के सबसे 
निचले पायदान पर 
खड़ा खड़ा
आलीशान 
सपने देखता 
एक दिन! 
चुक जाता है! 
दुख है; 

जिंदगी में ये 
ज्वार भाटे का खेल
बाहर की दुनियां से 
इतना सुंदर मेल 
कौन सिखाता है इन्हे।
ये सब 
इतने कम समय में 
कैसे हो जाता है,
कुछ भी मेरे 
समझ नहीं आता है।

कैसे चाह कर भी ये लोग
अपने को 
वैसे नहीं रख पाते हैं।
आखिर वो खुद ही तो 
अपने बल पर ही तो 
यहां आते हैं।
शायद चाहते तो हैं रखना, 
पर न जाने 
यह समय भी क्या चीज़ है,
सबको एक दिन उखाड़ना
बराबर करना और
आत्म विचार पर
बैठा कर 
प्रायश्चित की शैय्या पर
बैठा ही देता है।
 
उनके पायदान कैसे 
नीचे खिसक जाते है 
अपने आप।
लाख प्रयत्न 
करने के भी बाद।

पांच, दस, पंद्रह 
दिन, महीनो, वर्षों बाद! 
पर यह अवधि 
आम आदमी को
उसकी सोच को, 
जन मानस को
भीतर से मथती रहती है।
और सच कहें तो
इसी मथने से निकले मक्खन से ही  
एक सच्चे समाज की
अच्छी नींव पड़ती है।

इतना अच्छा 
चलकर आए थे, 
कोई टोपी लगाए
कोई रंगीन बाना पहने।
क्यों नहीं चल पाते वैसे, आगे
जैसे चलते थे। 
पहले खुद ही अभी
जल्दी तक, 
यहां पहुंचने के पहले।
खेद है, संताप भी है! 

मैं समझ नहीं पाता।
वही लोग, 
वही दुनियां, 
क्यों बदल जाते हैं।
क्या दुनियां बुलंद
आवाजों के नारों से ही चलती है
सच्चाई कुछ भी नहीं है।

तर्क और समझ 
के पैमाने 
लोगों के
अलग अलग दिखते तो हैं 
पर बने तो 
एक ही मैटीरियल के हैं।
कोलाहल से या 
शोर से निकले झाग को
जब ध्यान से देखा
लोगो का आगे बढ़ना 
और बड़ा दिखना।
वास्तव में कुछ भी नहीं था। 

यह स्वार्थ, और 
मानवीय कमजोरियां
इनकी मिट्टी है।
कैसे धुलेगी, 
वही हैं, ये
चिंता तो एक ही है।

वो शिखर, निर्मल
चमचम, निर्दोष
हिमालय!  
से
निकली स्वच्छ, 
शीतल, परम पावन
एकरस, निर्मल, अविरल
तुहिन कणों से बनी
नदी गंगा! 
फिर कहां से लाऊं! 
जिसे 
तुम्हे.... मै 
अपने हाथों पहनाऊं।
फिर भी वेदों से पढ़ा है
सद्कामना शुभ का 
आधार बनती है,
अतः मेरी भी शुभ कामना 
आप सभी का भाग बनती है।

सारांश:  कुछ लोगों को समाज में बहुत जल्दी शिखर पुरुष जैसे, नेता, अभिनेता, ऑफिसर, व्यापारी, समृद्ध और विशिष्ट बनते और उतनी ही तेजी नीचे गिरते हम देख रहे है। आखिर जो गुणों सात्विकता, कठिन श्रम, ईमानदारी आदि से ऊपर उठे गिरे क्यों?  क्या अपना धर्म या अपने अच्छे कार्य से वे हट गए। क्या हमाम में सभी नंगे। सभी सीट से चिपक गए। विधाता बने रहना ही लक्ष्य हो गया। अब गंगा को कैसे खोजें, अच्छे नेता, गुरु, समाज उद्धारक कैसे चुने एक बड़ा प्रश्न है। 
अच्छे 
जय प्रकाश मिश्र




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