जब एक सभी को होना है तो अंतर क्यों है, जीवन में।
मुक्तक : एक
कुछ पन्ने हैं, पलट... लेता हूं,
कुछ लम्हों में..गुजर आता हूं
कुछ गलियों... से चुपचाप मैं
बस ऐसे ही... गुजर जाता हूं।
मुक्तक: दो
ले के संबल इन अधरो का,
कैसी दुधिया, दुधिया सी
हंसी बिखरी है।
लगता हरी भरी दूब ऊपर
माघ में सुनहली सुनहली
सी धूप बिखरी है।
मुक्तक: तीन
आज की कविता:
यह उथल पुथल
इस जीवन की
सागर में उठती
लहरों सी।
उठ उठ गिरती,
गिर गिर उठती।
चट्टानों से
लड़ती भिड़ती।
पग पग के
हर अवरोधों से
बिनती करती
आगे बढ़ती।
क्या रस्ता ही
पूरा करती?
आलोकमयी,
आनंदमयी!
सुर-अमृतमय,
रसना मधुमयि!
गति छंदित,
चितवन मुक्तिमयी!
जीवन सरिता
किस ओर चली।
क्या बिछड़ गई
अपने पथ से,
क्या उतर गई
अपने रथ से।
क्या चंचलता की
सुंदरता पर
मचल गई
यह शिशु मन ले।
इसके भीतर
कोई बैठा था
चिर, अजिर,
अनामय लगता था
आनंद स्रवित
भीतर भीतर
रसमय रसमय
इसे रखता था।
वह एक यहां,
वह एक वहां
मुझको तो
ऐसा लगता था,
पर, 'पर' चटका
चिड़िया बोली
मैं उसके जैसा
लगता था।
देखा खुद के,
हर अंगों को
मैं एक सभी के
संग ही हूं
मैं नहीं अकेला
हो सकता
मैं पूर्ण सदा
सबके संग हूं।
सब एक यहां,
हम एक यहां,
कुछ अंतर है क्या
सपनो में,
मिट एक
सभी को होना है
तो अंतर क्यों है
जीवन में।
जय प्रकाश मिश्र
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