उसके पास.., क्या था ?
पास..,उसके क्या था ?
कुछ भी नहीं था..,
हाथ खाली,
पांव खाली,
पीठ पीछे,
यदि कहूं... तो
दुनियां ही... खाली।
पर,
नही!, नहीं !
कुछ तो..... था!
सारे, और सभी
संभ्रांतों, संपन्नों,
दुखी, दरिद्रो से
बिल्कुल अलग था।
इसी के चलते
हर कोई,
चाहे जो, हो!
सामने उसके
बौना! बौना! लगता था!
हां सचमुच, वो
बहुत.., बहुत गरीब था।
हमारी तुम्हारी
सोच से भी कुछ
ज्यादा ही......... था।
लेकिन.... उसका अपना
और पत्नी दोनों.... का
आज के दोनों,
सामाजिक कूपूतों
'दरिद्रता और अभाव'
के खिलाफ!
खुला विद्रोह था!
दरिद्रता और अभाव
की अंतिम, और चरम परणिति
"पीड़ा और यातना" को
उनका 'सहने का ढंग'
इतना
सब्र लिए होता था'
कि
पीड़ा और यातना दोनों
अपने भाग्य पर रोते,
बिलखते और पछताते थे।
अपनी वीभत्सता, कुरूपता
और निर्दयता पर
उन्हें नाज़ था।
पर यहां
वो दोनों
इन दोनों से,
नीचे....
बार बार मात, खाते नहीं....
हार.... जाते थे।
अपने ऊपर
इतना, तरस..... खाते,
की जिसके लिए वो बने थे,
उसका मिजाज ही.....
भूल..... जाते थे।
हां सब्र ही और धैर्य ही
हर विकल्पहीन का
आखिरी संबल नहीं
मजबूत आधार होता है।
ऐसे ही कुछ लोगो के सामने
दुनिया का बड़ा से बड़ा
आदमी भी
बौना दिखता है।
निष्कर्ष: जीवन बाहरी साधनों से जिया जाता है। लेकिन आंतरिक शक्ति और गुण इससे लड़ने के लिए वास्तविक तरीके साबित होते हैं। हम धैर्य और सब्र से कठिनाइयों से लड़ ही नहीं उन्हे जीत भी सकते हैं।
द्वितीय पुष्प
उन्हें अपनी आंखों पर,
बड़ा फक्र था।
वे दूर से
देखती, पहचानती,
बात करतीं थीं।
पर उसके तो
आंखे ही नहीं थीं,
वह फक्र किस पर करता!
पहचानना, देखना, बात करना
आंखों से ही तो नहीं होता,
गंध, छुअन और चेहरे की रंगत
से भी तो होता है।
अब उन तुनक मिजाजों
की बात कौन करे!
एक बात कहूं!
एक सच्चा दोस्त
एक सच्चा आइना भी होता है।
निष्कर्ष: हमे अपने ऊपर अपनी विशिष्ट उपलब्धि का घमंड नही करना चाहिए। दुनियां में और बड़ी चीजे भी हैं और लोग भी। जीवन में सम रहें।
जय प्रकाश मिश्र
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