एक ओढ़नी, बादल की ले के!

एक ओढ़नी 

बादल की ले के! 

वो... मेरे 

पीछे पड़ी है,

जाऊं कहां... ?  

तूं ही... बता!  

अरे! यह...,

प्यास की दरिया!  

मेरे पीछे... लगी है।

जन्म कितने...

ले चुका हूं,

भागता.... 

हर बार हूं,

क्या कहीं 

कोई.... प्यास 

अब भी..., 

आज भी..., 

बाकी.... बची है।

प्राणियों को जन्म लेना ही पड़ता है, इसमें उनका कोई वश नहीं है। प्रकृति अपनी चिर प्यास के दृष्टिगत अपनी व्यवस्था से, बार बार प्राणी व अन्य जीवो को पैदा करती, बढ़ाती और बूढ़ा करती है। बादल की ओढ़नी यानी अपनी सुन्दरता के रूप पाश में प्राणियों को जीवन पर्यंत प्रकृति बांधे रहती है और जन्म मरण का खेल सतत करती रहती है।

एक दिन..... 

बैठा यहीं पर

गहराइयों में मैं गया।

खो गया!  

उस अतलता में! 

डूबता भीतर गया।

हर तरफ थे रास्ते, 

बंटते हुए एक दूसरे से

अनगिनत, हर एक पग पर। 

मिल रहे थे साथ में, 

सब रास्ते,

कुछ दूर चल कर।

नियति नटी का यह मायावी संसार आश्चर्यों से भरा हुआ है। अनन्तता इसकी नाभि का एक हिस्सा मात्र है। यह विपुल संभावनाओं, घटनाक्रमों को संजोए आगे चलती है।

मैं कहां जाऊं!  

चुनूं किसको! यहां!  

यह सोचता, 

बस एक पग.. 

 ....आगे बढ़ा,

पीछे..... मुड़ा 

बस..... 

एक पल को,

क्या हुआ! 

ये! क्या हुआ! 

इतना बड़ा संसार था,

मेरा यहां पर! 

कदम हटते हाय! मेरे

शून्य, में सब छिप गया।

भाव: बिभ्रम और नवीनता का ताना बाना लिए यह नियति नटिनी रूप परिवर्तन की जादुई दुनियां में सबको पराभूत करती रहती है, उलझा लेती है। इसका यह संजाल क्षणों में ही सृजित और विलुलित, बनता बिगड़ता रहता है। अतीत के सारे रूप रंग आकृतियां शून्य में चली जाती है।

मैं देखता हूं,

काल-गति को, 

काल को

चुप खड़ा हो, पार्श्व से; 

बादलों सा उड़ रहा है,

बादलों सा बरसता है।

रंग कितने धारता यह 

रश्मियां ले सूर्य की।

बैठा हुआ है हर किरण के 

मूल में फुफकारता यह! 

तैरता यह जा रहा है

उर्मियो की सतह पर! 

उठ के गिरता, 

गिर के उठता! 

तरलता का स्वांग भरता,

जा रहा है 

समय के साथ रूप, रंग, आकृतियां, प्राणी सतत बन बिगड़ रहे हैं। बादलों की वृष्टि से नीचे माताओं के गर्भ में आ रहे हैं। सूर्य अपनी ऊर्जा से सबको जीवन और भरण पोषण करता रहता है। समय का डर, मृत्यु, उसके अंतर से फुफकार करती रहती है। लहरों सा लोगों का जीवन जन्म मृत्यु के बीच झूला झूल रहा है 


है सतह पर राज इसका

चमचमाता.. रूप धरता, 

वायु के संग.. बह रहा है

सतह को भी छोड़ता है।

लो 

आ गिरीं पत्थर के तट पर

लहर, पानी, उर्मियां.. सब

चमचमाती सारी.. छवियां

लहर के संग... छटपटाती 

शून्य में सब.. मिल गई हैं।


उच्छाल सारा.. हृदय का

श्रम समेकित.. लहर का,,

सब शांत देखो हो गया है

रेणुका के.. साथ मिलकर

भीगे.. हुए.... तटनीर पर।

भाव: जीवन में लोग दुनिया की चमक दमक में खोए इसके मूल से दूर ही आनंद से दूर ही पूरा जीवन बिता देते हैं। कुछ लोग अपने संस्कार, संस्कृति को भी क्षणिक सुखों के लिए छोड़ उड़ने लगते हैं। और एक दिन कठिन यथार्थ के पत्थर पर जीवन ला पटकता है। फिर जीवन संध्या की शांति स्वागत करती है और बालुका के तट नीर पर अंतिम बसेरा ही शेष बचता है।

नई किरणें उग रही हैं 

नव क्षितिज पर,

नई लहरे उर्मियाँ बन 

फैलती हैं सतह ऊपर।

उछलती हैं, खेलती हैं, 

श्रम शिथिल हो बैठतीं हैं,

जीततीं हैं, हारतीं है 

जिंदगी के खेल सारे खेलती हैं।

आ रहीं है धीरे धीरे  

चमचमाती इठल करती

देखता हूं!  

शून्य बनकर देखता हूं! 

खेल इनका! 

आज खुश मैं हो रहा हूं! 

कुछ नहीं है!  

जन्म लेना,

जीतना और बड़ा बनना! 

इस जगत में देखता हूं।

शांत रहना, 

शालीन होना, 

ही प्रथम है

खेल के, इस जगत में।

🥹 🤤 🤗  😴 🙋

जीवन के पार से जब जीवन को देखा जाता है तो इसका सत्य थोड़ा थोड़ा समझ आने लगता है। जब तक इसका एक्टिव पार्ट व्यक्ति होता है इसका सत्य उससे दूर दूर भागता रहता है। बाहर से समझ में आ जाता है की जीवन का खेल भी बहुत सच्चाई, ईमानदारी, और शांति स्थिरता से ही खेलना चाहिए क्योंकि प्राप्तियां मूल्यवान नहीं खेल के दौरान आता आनंद, संतुष्टि, पछतावा रहित हमारे कर्म ही वास्तविक जीवन थे।

जय प्रकाश मिश्र



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