इतना ही तो समझना था।
प्रथम सोपान
"ताज़गी" की खोज
आज
पूरी हो गई,
जब
चांदनी के घर
जश्ने-दावत, ही, हो गई।
भाव: जब ऊंट पहाड़ के नीचे आता है तो उसे सब कुछ पता लग जाता है। जो चमकता है दूर से वह वास्तव में सब सोना ही नहीं होता। इच्छाएं इच्छा पूर्ति के बाद की हताश अवस्था देख स्वमेव घुल जाती हैं।
चांद आया
पास मेरे
पूछ बैठा,
क्या अब आप की
'तसल्ली'
पूरी हो गई!
द्वितीय सोपान
धूप थी,
गिरती थी, हर ओर;
उसके घर पर भी,
पड़ जाती थी।
बिछावन तो थी ही नहीं
उस घर;
पर, सच कहता हूं!
आंखों देखी!
अहा! कैसी पश्मीने की
सुनहरी बिछवन
अल-सुबह धूप ले,
घर भीतर
बिछ जाती थी।
भाव: प्राकृतिक समस्त सुविधाएं सभी मानव मात्र की एक सी उपलब्ध हैं। लेकिन उनका पूरा आनंद और उपभोग गरीब लोग, मुफलिसी में जीने वाले ही कर पाते हैं। सुविधाभोगी लोग कृत्रिम व्यवस्था में ही जीते हैं निरा प्रकृति से दूर ही उनका जीवन चलता है।
तृतीय सोपान
यह हकीकत थी,
सच थी!
जब भी
हवा बहती थी,
जिस ओर
से सही;
उस घर पे हमेशां मेहरबां
रहती थी।
मै खुद गवाह हूं इसका!
वो बात दीगर है कि
उसके घर
की दीवारें ही नदारद थीं।
चतुर्थ सोपान
चांदनी! मैने,
भर जिंदगी!
वैसी
कभी नहीं देखी!
उसके घर
भीतर....
जैसी... गिरती,
देखी।
सच कहता हूं!
जितनी थी,
पूरी देखी।
पूछो क्यों?
उस चांदनी के सिवा
उस घर में
और कुछ भी
देखने को
था हि नहीं!
पंचम सोपान
तसल्ली खोजी!
मेरी खोज थी!
पूरी जिंदगी!
ना मिली, तो बस..., ना मिली!
मिली तो, किसके सिफत
जिस घर, सुबह की
कोई चाहत
हि, 'न' थी।
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