जिंदगी एक दिवस है, संपूर्णता की पूर्णता का।
क्या है,.... होता ?
इस जगत में…!
हर एक क्षण…,!
हर एक पल में…!
देख तो!
छीजना…,
अपघर्षणा…,
क्षीण… होना
अपरूपना…,
सतत खोना…
शक्ति को..,
सौंदर्य को…,
सामर्थ्य को…
हर रूप की..,
हर जीव की..,
हर वस्तु की..।
क्या सत्य है यह?
हां! सत्य है यह।
देख तो,!
विश्व में परिणाम,
सबका, अंत में
बस मृत्यु है या
विघटन, घटन, समरूपना
ही ध्येय है,
इस मृत्यु का!
मृत्यु क्या है ?
विलीनता... बस रूप की!
स्मृति के संग... संबंध की!
अधिकार.. की,
अपमान.. की!
सारे जगत व्यवहार.. की।
सामर्थ्य के संग शक्ति.. की
बृद्धत्व.. की, हर व्याधि.. की !
अहम.. की, सम्मान.. की,
या और कुछ है!
तो मृत्यु क्या वह मुक्ति है
सारे जगत जंजाल की ?
या पूर्णता है, इष्ट की,
संकल्प संग अभीष्ट की,
जिसके लिए जीवन बना
जिसके लिए यौवन बना।
जिसके लिए मन, बुद्धि की
चादर ओढ़ाई
अनुभवों ने,
समय ने।
जिसके लिए
ता उम्र हमने
की चढ़ाई अनवरत
समय के इस
राख रूपी ढेर पर!
तो मृत्यु क्या,
एक द्वार है!
उस सतत पथ पर,
समय के,
जीवन जहां,
अवमुक्त हो,
शांति का,
विश्रांति का
आनंद पाता
चिर रात्रि सा !
पुनर्जीवन पुनः
ले ले, धमकता
इस विश्व में,
युद्ध करता,
आगे बढ़ता।
तो जिंदगी क्या दिवस है;
संपूर्णता की पूर्णता का!
और मृत्यु बस एक रात्रि है;
प्राप्ति है,
संयोजना की;
पुनः फिर से
जिंदगी का यह दिवस
जीने के लिए;
उस समय पथ पर
सतत है जो
चल रहा इस विश्व में
निज ध्येय लेकर।
मैं पूछता हूं!
क्या,
जीवन समर्पित मृत्यु को है ?
या
शक्ति के
अवधान के संग
सामर्थ्य की संप्राप्ति का
शम रूप की अध्याप्ति का।
हां, हर मृत्यु बस एक रात्रि है
एक दिवस के अवसान की!
जो जीवनों में चल रहा
थक रहा है पक रहा,
शक्ति से च्युत हो रहा।
फिर मृत्यु को है खोजना तो
रात्रि को ही खोजते हैं
मृत्यु का यह रूप छोटा
चल इसी में बैठते हैं।
घूमती है
रोज ही यह
इस धरा पर,
नव शक्ति भरती,
स्मृति विकलता
क्षीण करती,
उद्वेग को परिच्छिन्न करती
बिहरती है, इस जगत में।
तो रात्रि क्या है ?
मृत्यु का ही रूप
छोटा, देखते हैं,
या मिलन है,
शक्ति का यह ?
खोजते हैं!
क्रमशः आगे।
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