कम हिलो, आवरण रखो फुसफुसाती बहुत धीरे कान में, रस घोलती हैं।
अपना पट उघड़ता
देख कर
ये डालियां,
चिक्कन, नरम इन
पत्तियों को बरजती हैं।
कम हिलो,
आवरण रखो
फुसफुसाती बहुत धीरे
कान में, रस घोलती हैं।
खुद डगमगाती,
हिल रही है
हृदय लेकर,
झुक रही हैं,
छोड़कर,
लाजो-हया की
भूमि को।
स्पर्श करना
चाहती हैं, कर बढ़ाते
सजल, जल ओढ़े हुए
नदी के इस परम
पावन पाट को।
साख को ले संग
अपने झुक रहीं हैं
डालियां,
जो स्वस्थ हैं,
लद गईं हैं,
सावनी पा
पत्तियों के भार से।
पेड़ भी, बाहें पसारे
चरमराता, झूमता है, तने तक,
पवन बागी हो गया है,
देखकर, इन फुर फ़ुर बरसती
बदलियों की चाल को।
बूंद की लड़ियां
पिरोए मोतियों
की हाथ में,
बरखा मगन,
लेकर हृदय अपना
तरल,
कोंपलों और किसलयों
के बीच जा जा
उरबंध उनके
खोलता,
हिलकोरता है,
उरज उनके छू रहा है,
बावला बन
देखता हूं!
पवन का यह पूत
नटखट
बनके झोंका
देख तो!
विकल हो हो
भार लेकर
जल कणों का
शीर्ष पर,
क्यों सुघड़ पेड़ों संग
हंस हंस खेलता है।
नाचतीं हैं
टहनियां ले फुनगियों
को गोद में।
किलकिलाती
शोर कितना कर रही हैं,
पत्तियों पर बरसती ये
शिथिल हैं सब अंग
नच कर बारिशों के
संग ढीले हो रहे हैं।
नख क्षत बनाती धार
जल की गिर रही है
आज नभ से।
द्वितीय पुष्प
एक थी सुरमणि
देवताओं की भी शोभा,
अनोखी, शीतल, सुंदर, मधुर, मोहक
मोतियों की स्निग्घता, लावण्य चुराती,
झलकती थी, स्वर्णाभ मुक्ता सी
झिलमिल, झिलमिल द्युति ,
उन्नतांगों, अवनतांगों, कपोलों,
पुष्ट, कर बल्लरी, पृष्ठों में
सहज निहंकार,!
पाश थी
मन
की।
अद्भुत थी,
सब सामंजस्य,
रंग, अंग, लरछी सी
तरंगित, विलंबित चितवन।
बेमिसाल, स्वच्छ नेत्र,
काले निदाग
दो निर्मल तराशे मोती
तैरते थे उनमें सच्चे
वो भावनाओं
पर बहते, हिलते,
ढुलमुल होते दिखते
क्षण क्षण छूते अछूते रहते।
पूरे परिदृश्य से, कुछ कटे कटे।
अनसंस्पर्शित, उदार, अलोन सा रूप
पर स्वर्ण का लेप झांकता भीतर,
सब कहीं, तुला तुला हुआ सब
सब कुछ आपस में, लंबी
नासिका ढली हुई सी,
आह वे होठ रस
छलके
मीठे
मीठे
हल्के, हल्के
हलके,हरस्मित में मिल
बिल्कुल गुलाबी गुलाबी फाहों जैसे।
पर
भाग्य
तो भाग्य
रंग रूप सब
पर भारी, अवघरदानी
की मनमानी, जो जिसे दे, दें।
पर वह
दीपित थी, दीप सी
अंधेरे में भी जलती दिखती थी,
चरम थी,
पारदर्शी गुलाब जल में
गुलाब के फूल का ताजा रंग
मिला हो कुछ ऐसी प्रभा
अंग अंग से निकलती थी।
जय प्रकाश मिश्र
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