हो के मगन एक बच्चा बोला।

छुल् छुल् 

उठ गिरती 

नन्हीं सी,

दुबली सी लहर 

गिर उठती थी। 

प्रकृति का समस्त कार्य धीमे धीमे मस्ती और आनंद में पूरा होता है। वहां उत्कलता और उद्वेग को स्थान नहीं। बड़े बड़े कार्य वह छोटे छोटे इकाइयों में बांटकर पूरा करती है।

छूने वो लगी 

उन थापो सी ,

पड़ती है जो 

मद्धिम तानो सी।

नियति नटी हर कार्य सम्पादन में सुख और आनंद के साथ लय छंद से आगे बढ़ती है।

उठ आई 

वहां से 

मुझ तक वो

सीनों में 

ठुमकती 

हिलती सी।

उसका समस्त कार्य जैसे रंग रूप स्वाद आदि हर प्राणी के लिए सुखकर तो होता ही है, सबके लिए उसकी प्राप्यता भी संभव होती है और सबमें उमंग भरने वाला होता है।

लय ताल में कुछ 

ढलती, ढलती

बहकी, बहकी 

कुछ कहती थी।

यद्यपि यह समष्टि अपनी मूक और शांति की भाषा में हमसे सतत संवाद करती रहती है पर हम उसे अनदेखा कर देते हैं ध्यान नहीं देते।

स्तब्ध खड़ा,

सब देखा किया

मंदित पैरों से 

चलती थी।

यह अपना कार्य कलाप अत्यंत मधुरता और क्रमबद्धता से धीमे धीमे करती है जो हमे अपनी पूर्णता पर स्तब्ध कर देते हैं।

मुझमें 

अंतर्भेदन करती, 

मन को हर 

बश में करती।

यह प्रकृति अनेकों बार हमे सोचने पर मजबूर कर देती है। और अपने सुंदर कार्यों से सौंदर्य सृष्टि कर, स्वादिष्ट फल फूल से मन हर अपने वश में कर लेती है 

वो बैठ वहीं पर

नटनी सी 

तन तोड़ अहा 

नचने ही लगी।

नियति नटी का नृत्य वसंत में खिले पुष्पों, घिरते और बरसते मेघ, चमकती बिजलियों के रूप में आनंद स्फुरन कर देता है।

मद्धिम सी सुबह 

कुछ बोल उठी

अलसाई सी थी, 

पर डोल उठी।

यह छोटे से निष्पाप शिशु सी हर सुबह आनंद भैरवी बनी आलस और मद्धिम, प्रकाश के बीच आराम आराम से शुरू होती है। और फिर ऊर्जा से भरती जाती है।

बादल ने 

घूंघट थोड़ा किया 

पुरवइया झकोंरों में 

निदने लगी।

हर सुबह जो अपने में अपूर्ववर्ती सकल नवल होती है, उसका श्रृंगार यह नियति अपने बादलों, शीतल वायु के मंद मंद झकोरों से अनुपम श्रद्धा से करती है। इतने प्यार दुलार में यह कभी कभी छोटे बच्चे सी सुखनिदिया लेने लगती है।

पंछी ने कहा 

क्यों ऐसी हो

सूरज आया 

तुम बैठी हो।

प्रकृति पुत्र और पुत्री पंछी बन बन उससे विनोद भी करते हैं। और उलाहना देते हैं की दिन चढ़ आया और मां तुम अभी तक सहज नहीं हुई ।

देखो न जगत है 

जाग गया,

तुम दुल्हन बन कर 

बैठी हो।


तुम देवी हो, 

जग की सोचो

प्रिय जग को

अपना अंचल दो।

वह प्रकृति शिशु पुकार करता है की हे! संसार को संबल देने वाली मां आप आज के दिन को और अपने बच्चों के लिए तत्पर हों। सभी को उनका प्राप्य मिले।

यह प्रात नवल 

तुमसे है धवल

तुमसे ही है सारी

चहल पहल।


फटकारती पंख 

चिरैया उड़ी 

नदिया की तरंग में 

पवन बही।

इन छोटे छोटे प्राणियों का खयाल कर सृष्टि की देवी ने शक्ति और गति को धारण किया जिससे बयार बहने लगी और चिड़ियों ने उड़ान भरी। जीवन गति शुरू हो गई।

सावन ने हरियाली ओढ़ी 

रिमझिम रिमझिम बरखा बरसी

नदिया का तन भी बढ़ने लगा

खेतों में हलचल दिखने लगी।

हो के मगन बच्चा बोला

मैय्या गैया को दुहने गई।

फिर क्या था पूरी प्रकृति अपने स्वाभाविक लय ताल में छंदमय हो काम पर लग गई। खेतों में किसान मोर्चों पर जवान और घरों में देवियां तत्पर हो काम पर लगीं। ग्रामीण बच्चे ताजा दूध पीने के लिए गाय दुहने का इंतजार करने लगे।

जय प्रकाश मिश्र

द्वितीय पुष्प

एक गोला… और सूरज.. आग का

संग घूमते हैं इस.. अजर ब्रह्मांड में

साथ में साथी हैं जिसके मुख्य नव

हलचल लिए अपने हृदय संभाग में।


दूर हैं एक दूसरे से, बात भी करते नहीं

मगन हैं सब आप में पार्श्व भी छूते नहीं 

नाचते हैं नाच.. ऐसा, धरातल से हीन हैं,

नाद सबका एक है, पर गिरा  गंभीर है।

झुक गया 

कोई धुरी पर 

नाचते ही नाचते

द्रवित मन जिसका हुआ 

नीर बन के चू रहा।

वही तो जीवन हुआ।

जय प्रकाश मिश्र




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