आपस में मिलजुल के रहो, प्यार की कलियां सींचों।।

भावना सूत्र:  ईश्वर ने दुनिया में हर जिंदगी की किताब में दिन रात रूपी सुंदर और साफ पृष्ठ,  सबको कुछ करने के लिए दिए थे। ये पेज नित्य हमे प्रातःमिलते हैं और रात में स्वतः बंद हो जाते हैं। कुछ लोग इस वरदान को अपने कुकर्मों से अपने लिए ही नहीं मनुष्यता के मुंह पर कालिख लगा देते हैं।  शेष आप खुद पढ़ें।

उस, किताब.. के 

कुछ ……….ही,

पन्नों का, किरदार

रहा होगा, वो भी।


जो…. हर रोज,

सुबह.. खुलती है,

शाम. बंद होती है, 

हम सभी के लिए

सदियों……..से।


तो क्या ……… 

आदम ही था!....वो ? 

या गुस्ताख था..! 

पर कितना था! 

देख……….तो

खरोच डाले…… हैं,

हर पन्ने, उसने, अपने…

गंदे, नापाक, नाखूनों से! 


कितना रक्त! भर डाला! 

भाई का कत्ल! 

 कर डाला! 

लुहुलूहान उसने तो, 

मनुष्यता को ही 

कर डाला। 

पोत ली कालिख!

जिंदगी के हर पेज पर, 

उसने क्या सिर्फ आज के लिए! 

नहीं सदा के लिए! 


दिए थे जिसने 

उसे ये पेज, 

आज 

शर्मिंदा है! 

ऐसे नमकहराम 

गुस्ताख को

जमीं पे उतारने 

के लिए वो भीतर से

पशो-पेशिंदा है।


कितना सुंदर, परि-शांत,

स्वच्छ, पृष्ठ, नेचर ने, 

उस दिन भी, 

उस किताब का 

पलटा होगा, 

खिलखिला कर, 

हंसते हुए

प्रात ने, 

रात्रि को 

अलविदा कहा होगा।


सुबह की सुनहरी 

चमचमाती लालिम आभा 

एक बार लजाई होगी;  

इतने बड़े दिन को 

अंक भरते हुए, शरमाई होगी।

ताज़ी, मधुर, मस्त 

हवा भी बही होगी, 

स्निग्ध मोती से

महुए के फूल को

छत्ते से, टप टप चूते

देख कर गिरते हुए।


खिलती हुई 

कलियों की

मकरंद लेकर, 

पूरब की ओर से 

मित्र* अपना                  *(सूर्य देवता)

लोक कल्याण 

संकल्प ले

निकला होगा।

तप पथ पर।

हिली होंगी मुस्कुराती 

खिलती कलियां

दुबली पतली लम्बी 

टहनियों ऊपर।


तुम कहते हो 

कामयाबी पाई उसने! 

पोत के रंग लाल, 

उन साफ पेजों पे, लोगो का! 

खता की है उसने, 

सिला भी मिलेगी ही, 

उसको जल्दी ही,

फिर भी खुदा माफ करे! 

ये लाल बदरंग किसी को भी

देखने को न मिले! 

अपनो के लिए नियामत बटोरी

सोचते हो तुम, 

पराया कौन? जानते हो तुम! 

सब्र रख, सब्र से सब होता है, 

सब्र के आगे तो एक गहरी खाई है।

बेसब्र का परिणाम तो सदा से जगहंसाई है।

नियति की मार बहुत गहरी होती है

बचो उससे सभी, 

उसके दिए पन्नों की कीमत समझो

आपस में मिलजुल के रहो, 

प्यार की कलियां सींचों।

जय प्रकाश मिश्र

द्वितीय पुष्प

हाय वह कैसा हृदय है

छोड़ कर, 

इतनी मुलायम

घास को; 

दूब की इस उर्ध्व रेता 

उर्वरी को

है बनाकर छोड़ देता 

धूप में

तपते हुए अंगार मुंख में

और आगे बढ़ है जाता

कुछ बनाने 

और सजाने

की पुनः 

फिर आस में।

तृतीय पुष्प

बहती… नदी थी, 

बूढ़ी….. हो गई!

हरियाली… छोड़, 

धतूरी….. हो गई। 

पहाड़ काट.. काट 

सताया इतना हमने

रसवंती…थी…तब

अब… रूरी हो गई।



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