क्या! हम मनुष्य हो गए हैं!
क्या! हम मनुष्य हो चुके हैं!
तुम बताओ?
वर्ष कितने हो गए हैं ?
जीतते हैं,
शांति नोबल वर्ष में!
खेलते हैं खेल
हम सौहार्द्र में,
राष्ट्र में,
इस राष्ट्र से
उस राष्ट्र में।
उजली चादर सभ्यता की
ओढ़ कर हम,
फक्र में भर,
घूमते हैं!
पर उसी संग,
आज भी हम
कोख में,
एक अबोले
बाल शिशु को, पकड़ कर
एकांत में
गला उसका
घोंटते हैं।
भ्रूण हत्या!
आज भी हम
कर रहे हैं।
तो, हम मनुज क्या हो गए है?
वर्ष कितने हो गए हैं,
तुम बताओ!
सोच कर यह मुस्कुरा-या
मुस्कुरा-हट, फोड़ कर
हिय गर्भ मेरा, निकलती है,
तोड़ती पाताल को
उस कूप सी,
बिन बताए निकलता,
धरा का हिय फोड़ कर
ले धार दुबली, बहुत पतली।
मथ कर निकलती, मेरा अन्तस
और निकल जाता है संग संग
खारा सा पानी आंख में,
चुपचाप ऐसी नमी लेकर!
इन अजन्मे आंखूरों की बेबसी पर!
रो रहा हूं सभ्यता की इस पहुंच पर!
जय प्रकाश मिश्र
द्वितीय पुष्प
अब क्या बचा?
अवशेष!
जो नित खींचता है
पीछे, मुझको,
क्या बाकी बचा है?
खेल,
जो ले खींचता है,
मन को मेरे,
साथ अपने।
लग रहा है फंस गया है,
*वेश मेरा, *(वस्त्र कपड़े)
चलते चलते,
आखिरी पग रास्ते में,
बेर के कांटे में उलझा
रोकता है।
जाने न कितनी बार!
जब जब गुजरता हूं!
चौड़ी सड़क पर
जिंदगी की,
देखता हूं!
जाल
है फैला हुआ,
दूर तक कोई न कोई।
फिर एक दिन!
निर्णय किया,
यह दुनियां है,
अनुभव यहां का सार है!
ये सोचकर आगे बढ़ा।
दुनियां को
दुनियांवी नजर में भांपकर,
देखकर, छानकर
और बीनकर
यह सोच कर,
अनुभवो को
पास की छलनी में मैं
बस *'छानने' को आज तक *(छनित)
रखता गया।
जो मिला हर रोज थोड़ा
और थोड़ा जो मिला।
पर क्या हुआ!
कुछ ही दिनों में
कुछ भी नहीं था, उसके ऊपर।
छन गया सब!
नीचे गया सब!
पर जमीं पर, कुछ था नहीं
जमी पर यदि गिरा होता
मिल ही जाता,
थोड़ा इधर, थोड़ा उधर।
गुम हुए, गुम ही हुए,
फिर ना मिले,
वही तो छनते, छनाते
जमते जमांते मिट्टी बने।
सोचता हूं
कितने रंगीन,
खुश-गवार, प्यारे थे।
चुलबुले, चमकदार, न्यारे थे,
अलबेले थे,
अपने तरह के तब तो
वे अकेले थे,
आखिर गए कहां!
कहीं तो हो,
भोगने को नहीं तो,
देखने को हों।
कितनी परेशानियों से
कठिन शीत, धूप, वर्षा,
सह सह मेहनत से पाया था।
बड़े जतन से इस जीवन को,
किनारे लगाया था।
भाव: जीवन असार ही है। पूर्णता जीवन के बाह्य रूप में नहीं आंतरिक अनुभव में होती है। सारी प्राप्तियां अनुभूति तक ही सीमित हैं उससे आगे वो बौनी हैं। चीजों को एकत्र करना एक वासना ही है, शांति प्राप्ति और संचय में नहीं सच्चे उपभोग और सहायता के कार्य में, लगाने में है।
जय प्रकाश मिश्र
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