वो… भी.. क्या दिन… थे,
वो… भी..
क्या दिन… थे,
झूले.. , झूले..
छत पर..
बैठे…
बैठे, ही…बैठे,
दुनियां.. सारी
सारी… ही भूले...
वो भी क्या
दिन थे…
झूले झूले।
सुबहे… कैसे,
खिलतीं थीं.. तब,
कैसे कैसे मंजर.. थे तब।
कोई आन
बैठता.. छत पर,
देख उसे..
बस.. एक नजर.. भर,
चलते बने..,
काम पर, दिनभर..
सच.. लगता
आकाश को छू लें..
वो… भी
क्या दिन.. थे….
झूले.. झूले।
परछाईं..भी,
हिलती… थी जब,
मन कैसे..
कुलांच…भरता तब,
हवा तैरती
उन जुल्फों पर
नागिन सी
हिलती थीं, वे सब
झूमां संग संग
मैं, उनके
वह सब कोई कैसे भूले,
वो भी क्या दिन थे…
झूले.. झूले।
कोई झुमुक
दौड़ता था जब,
अंग अंग हिलता
उसका तब,
मन कंदुक, बन
हिल हिल,
संग संग
कैसी उछल
कूद करता तब।
कैसे वह अब
मन से निकले
वो भी क्या दिन थे…
झूले झूले।
द्वितीय पुष्प
जाने न..! कितने..
रंग में… रंगी गई..,
यह!
इस रूप.. में मेरे सामने..
लाने से पहले..!
सोचता हूं, देख कर!
देखकर..! हैरान हो मत..!
शाख पर, पत्ते का बनना,
पुष्प बनना शीर्ष पर
फल मधुर स्वादिष्ट लगना,
एक दिन की बात,
तो होती नहीं है।
सोच तो! तपस्या,
कितनी उसमें छिपी है!
झूम कर
बरसे थे बादल!
सच यही था;
पर प्यास, धरती की
तड़पती! ग्रीष्म भर थी!
सोच तो!
प्यास… लेकर, देख..
तब, समझेगा तूं भी..।
मान* इन रिमझिम *(महत्व)
बरसती बदलियों का।
विकल तन
की प्रार्थना
का राज क्या है
भीग करके देख, रस में डूब तो,
शीतलक से निकल,
जलती धूप में, नंगे बदन हो
घरी एक, तूं बैठ करके
देख तो।
दुनियां में हर शुभ परिणाम के पीछे कठिन परिश्रम, सतत लगन, और तड़प छिपी रहती है। ईश्वर से प्रार्थना, जीवन मरण के संधि पर, अंतिम प्रयास और असमर्थता के बीच ही लोग करते हैं क्योंकि उसके आगे विकल्प समाप्त हो जाते हैं।
तृतीय पुष्प
बह जाने दो झंझा को,
किनारे खड़े रहो,
निकल जाने दो
विकट वर्षा जल को
दूर इससे रहो।
उन्माद "उसका"!
अव्यवस्था नहीं!
तुम संभाल लोगे ?
पहले बहोगे फिर
लगे, तो
किनारे लगोगे,
नहीं तो बस किसी के
सहारे ही लगोगे।
अपने बच्चों के प्रति क्रोध!
तुम्हारा विनाश!
उसका चयन नहीं!
अंतिम विकल्प है!
जो खुद
तुम्हीं ने छोड़ा है उसके लिए!
मिट्टी, पत्थर, पेड़, चिड़िया, चींटी
उसे लेकर वो आखिर
कहां जाए।
उसके तराजू में
इंसान और क्षुद्रतम प्राणी
अलग अलग नहीं,
हमेशा बराबर
हैं समझो!
केवल अपना,
अपनो का,
ही नहीं कभी उसका
और
उसके अन्य बच्चों
के बारे में भी सोचो ।
यह नियति-प्रकृति सभी का कल्याण स्वरूपिणी है।
जय प्रकाश मिश्र
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