वो मूक ! खड़ा देखता रहा !


मेरा एक घर था, 

सुंदर! अति सुन्दर!

मुहल्ले में नायाब!

लोग बाग.. 

तारीफ किया करते 

मुझको भी करते थे आदाब।


किनारों पे जगह थी 

काफी, खाली खाली,

तो एक छोटी सी, बगिया 

बसा दी मैंने उसमे न्यारी।


कुछ ही दिनो में

किनारे किनारे 

बड़े बड़े पेड़ आंवले के

नाग चंपा के, और 

मेहदी के लगवाए हमने।


समय के साथ 

सब बड़े हुए,

डालियां फैलीं

पत्ते भी निकले सबमें।


बाहर, सड़क के उस पार 

एक जंगली पेड़ 

सलोना सा, पहले से था।

रोज ही देखता, उसको मैं

अपनी दुनिया में, 

वो झूमता, 

पूरा मस्त था।


सड़क और घर के बीच 

सुरक्षा को देखते आठ फुटा 

ऊंची बाउंड्री बनवाई गई।

पर पेड़ तो सारे जड़, 

अंधे, गूंगे, बहरे, मढ।

अंदर घर के हों या 

बाहर घर के,

वे बढ़ते रहे, 

बरसात दर बरसात, 

झूम झूम

सामने ही मेरे अपने नचते रहे।

इतना ही क्यों 

हंसते, मुस्कुराते, 

गले भी मिलते रहे।


कुछ ही दिनों बाद 

सब खूब बड़े बड़े हो गए।

सड़क उस पार के पेड़ की 

शाखाएं प्र-लंबी हुईं, 

फूल भी निकले।


बढ़ते बढ़ते उसकी

फूलों से गदराईं, लदी, शाखाएं 

मेरी आठ फुटा बाउंड्री के 

भीतर तक भी निःसंकोच आईं।

सुरक्षा के मद्देनजर बाउंड्री की रोक, 

और सारी बातें अब उनके लिए बेमानी थी।

भीतर के मेरे पेड़ों की डालें

और बाहर के पेड़ों की डालों को

मिलने की पूरी आजादी ही नहीं 

मनमानी थी।


जब जब हवा बहती, 

या बरसता पानी,

आपस में सब मिल 

करते रहते मनमानी।

मुझसे यह सब! 

प्राकृतिक देखा न गया!

एक दिन मैंने 

एक वुड कटर को 

बुलाया घर अपने।

दोनो बलशाली मजबूत 

भुजदंड सी शाखाएं 

जो बाहर के पेड़ की थीं, 

और बढ़ आईं थी 

मेरे बाउंड्री भीतर

अपने सुगंधित फूलो 

कलियों को लेकर।

कटवा ही दिया, 

मैने उन्हें नृशंस होकर।


वो मूक! बधिर सा !

खड़ा देखता रहा!

अपने भाग्य पर 

वहीं खड़ा रोता रहा!

यह सबकुछ देख 

मेरे घर के पेड़ भी शर्मिंदा थे,

ऐसे कहने के लिए तो वे 

अब भी पहले जैसे ही जिंदा थे।


कुछ दिनों तक मायूसी सी रही

हवाओं के बहने से जो एक 

आवाज गुनगुनाती थी, 

अल सुबह जो चिड़ियां चहचहातीं थी

सब गायब थी।


बाहर खड़े पेड़ को 

बिना शाखाओं के देखकर

मुझे भी “कुछ तो” 

आत्म ग्लानि सी थी।


मेरे घर के पेड़ों की डालियां

तब काटी नहीं गईं थीं, 

बर,-लिहाज अभी तक वो 

बाउंड्री के भीतर ही थीं।

पर एक ही बरसात बाद 

आज वो बाहें फैलाए 

बुलाते है उसी पेड़ को, 

इतना ही नहीं

अब बाउंड्री से आगे भी बढ़ रहे हैं 

उसे छूने के लिए।


अब सोचता हूं बारी इनकी है

न्याय तो न्याय 

यदि इन आंवले की, 

नाग चंपा की या 

मेंहदी की कोई डाली

बाउंड्री से निकले बाहर,

तो कटने की बारी इनकी है।

लो आ ही गया वुड कटर 

ले के कुल्हाड़ी अपनी

तुम बोलो मैं अब क्या करूं

इन्हे हाथ बढ़ाने दूं,

छू लेने दूं इनको या 

कटवा दूं अभी इन सबको

तुम्हारी राय इंतजार के पहले

अभी, देखते ही देखते।


जय प्रकाश मिश्र






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