कल्पना के पर लगा कर

“सोच सकता हूं” मैं, 

बस, अब

सोच सकता हूं

कि “ये दुनियां सुखी है।”


पर, हूं 

कहां पर, 

किस फलक पर

सच में, मैं…, क्या देखता हूं,

घृणित, कुत्सित, 

अभि-शाप श्रापित

दुनियां ये, अपनी हो गई है।

अहंकारी, कुरल, निष्ठुर

धोखाधड़ी से भर गई है।

निर्दयी-प्रतिद्वंदिता की

मानसिकता से 

सनी, 

यह द्वेष से भी 

भर गई है।


स्वार्थ के दुर्गंध से,

अभिमान के पाखंड से,

धोखा धडी के, 

कठिन धागों,

से जटिल 

जकडी हुई है।


चहुंओर अपने दर्द, 

दुख, पीड़ा 

भयानक देखता हूं,

चीत्कार करती 

मानवों से भरी बस्ती,

नित्य ही मैं 

युद्ध के परिणाम से 

भीषण भयंकर देखता हूं।

रो रहे शिशु, 

रो रहा बचपन यहां है

रो रही है मां, 

बहन, बेटी सब यहां हैं।


क्या हुआ है, 

आज सबको, क्या हुआ है।

आदमी को 

कत्ल करने के लिए 

इस विश्व में,

आदमी का 

पेट भरने से 

अधिक, इन्वेंशन हुआ है।


देख कर हैरान हूं ! 

आदमी और आदमी भी

साथ नहीं हैं, 

जाति, धर्म, देश, वर्ण  

मानवता के, सगे दुश्मन हैं।


ये क्या हुआ? 

कैसे हुआ? 

कुछ सोचते हैं।

मैं, से मेरा. . . . 

शुरू होकर,

हम से हमारा. . . . 

हो गया।

देश, धर्म, 

जाति, राष्ट्र,

ही में सब कुछ बंट गया।

देखते ही देखते

निज ध्वंस पर पहुंच गया।


कल्पना के पर लगा कर 

कल्पना के देश में, 

मैं घूम सकता हूं, 

मैं बस, अब

घूम सकता हूं, 

सोचने को मात्र अब मैं 

सोच सकता हूं,

आह! आज भी 

मेरी ये दुनियां, साफ सुथरी है!


जय प्रकाश मिश्र






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