मद्धिम मद्धिम मुस्कुराता अपनी जगह पर खड़ा है

एक दिन 

बड़े इत्मीनान.. से 

बैठ कर,

पास में 

एक सोने की 

पुरानी अंगूठी रखकर,

अकेले, एकांत में,… 

खाली, सुनसान जगह तलाशी।

फिर बडे सुकून-ओ-अदब 

के साथ, झुककर

उसके ऊपर,

पूछा…,’उससे,’

जिसकी सारी 

चकाचौधी चमक 

गायब हो चुकी थी,

तब से, जब वो नई नई 

तराशी गई थी 

किसी तमाशबीन हाथों से।


पर वह सोना ही थी

यह जानकर मैंने पूछा; 

क्या तुम जानती हो 

खुद को!


तुम… कितनी 

कीमती…. हो!  

प्रिय हो, सभी को!

ऐसा क्या है तुममें 

कुछ मुझे भी तो बताओ, 

हम और तुम बिल्कुल अकेले में हैं,

तुम जरा भी मत शरमाओ।


वह अपने मद्धिम चमक के

साथ मुस्कुराती रही

देर तक मैं उसे प्यार से देखता रहा

वो मुझे देखती लजाती रही।


मैं झल्लाकर बोला, वाह! 

सारी दुनियां की मन, बुद्धि

अपने पल्लू में बांधने के बाद

ये चुप्पी,! 

फिर मैं ही बोला,

अपने बारे में तो,

तुम जानती ही हो तुम।

फिर भी,


कुछ.. पता है... तुमको 

यह.. मतलबी… लालची…,

दुनियां अपने मतलब से

बांधती है तुमको।

अपने चरम विश्वास से, 

माता पिता से भी ज्यादा

साक्षात लक्ष्मी ही 

मानती है तुमको।


संपत्ति से जुड़ी नहीं

संपत्ति ही हो तुम। 

इसलिए तुम्हारे लिए 

सबसे अपने सारे रिश्ते नाते,

संबंध तोड़ती है, सारी मानवता

क्या तुम्हे नहीं पता तुम्हारे सामने

फीकी फीकी है, 

दुनियां की सारी सारी सदा।


यह संपूर्ण मानव जाति

अपने भविष्य की चिंता

तुम पर छोड़,

तुम्हारे पीछे 

पागल हुई रातों दिन घूमती है।

पशु पक्षियों की बात तो मैं नहीं करता

विश्व की सबसे सुंदर नारी, 

और सबसे शिक्षित नर का 

अरमान हो तुम

ईश्वर तो नहीं पर उसकी

अदभुत और सर्व मान्य संतान हो तुम।


तुम्हारे आगे, दुनियां के सारे झगड़े, रगड़े 

धर्म, जाति, देश, रीति, नीति, कुल, वंश

धराशायी हैं।

तुम मनुष्यों की आत्मा की भी आत्मा हो

स्थूल हो पर सूक्ष्म की सूक्ष्मताई हो।


वह अंगुठी ढींठ बनी.. 

अंधे बहरे सी मूक

कुछ न बोली।

एक चुप, हजार चुप.. 

एक बार भी मुंह न खोली।


मैने अपने भीतर 

सोचा, विचारा; मन में,

जिसमे काबलियत… 

असली. होती है

वही अपनी तारीफ 

पीता है इस जग में।

इस स्वर्ण की अंगूठी सा, 

कीमती पत्थरो सा, 

हीरे सा और शायद

कुछ एक सच्चे संत मन सा।


स्थिर शांत 

निहंकार, निर्विकार 

निरपेक्ष, 

अपने में पूर्ण, 

राग हीन, 

बिना किसी द्वेष।


सोना क्या है, 

उसको क्या पता,

वो कब क्या बना, 

उसको नहीं पता।

पर यह सच है, 

जब वो जमीं में था, 

तो जैसे था, 

आज कंगन, हार, 

देश का जमानत दार 

बनकर भी, चुप चुप 

मद्धिम मद्धिम

मुस्कुराता अपनी 

जगह पर ही खड़ा है,

चमकना तो 

सामान्य स्वभाव था उसका, 

आज भी सच्चे संत की तरह 

वैसे ही पड़ा है।

चीजे बड़ी छोटी नहीं होती

उसकी निरंतर रहने वाली शांति, 

अविचलित सद्भाव, 

अविचल स्थिति, अविकारी प्रकृति

ही उसे सर्व स्वीकृति दिला देती है।

जय प्रकाश मिश्र






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