पांसे जिंदगी के पलटते, फिसलते चले गए

लिखना... 

नहीं...चाहता... था, 

निजता.. की, 

कोटि में आता है,

मामला

पांसों को 

फेंकने का है।         🎰

इसलिए 

थोड़ा, 

व्यक्तिगत भी 

हो जाता है।  


जब जिंदगी में.. मैं 

देखते ही देखते, 

बार बार

हारने.. लगा,

तो मजबूर.. हो,.. 

सोचने लगा,

जिंदगी के, ये पांसे,     🎲

अब सही क्यों नहीं, 

पड़ते मेरे

उम्र के आखिरी दौर में  

अब चलते चलते। 


अब, तब! 

जब, मैं.. बिल्कुल 

एकाग्र होकर 

फेंकता हूं इन्हें ! 

तब भी, 

गाहे बगाहे भी... नहीं 

बिसात पर 

कभी, भी पड़ते सीधे।  


आखिर ! ये वही, 

उस ऊंचे पर्वत पर उगे,

विभीतक पेड़ के बीज से बने, 

बेमिसाल पांसे ही तो हैं। 

जहां हहराती हवा, 

लहराता 

पवन 

जुए की 

इस विसात 

पर छलकने से पहले, 

इन्हें गोद में ले 

न जाने इन्हें कितनी बार 

मुक्त गगन में 

खिलखिलाती हंसती

छोटी बच्ची सी

झुलाती है झूले।         🎡


खिलाड़ियों के, 

हर्ष और विषाद, 

अपने पृष्ठों पर लपेटे, 

फड़ पर फिसलते 

उछल कर गिरते, 

सरसराते सरकते,

जब चलते हैं, ये पांसे,

सबकी निगाहों को 

कैसे एक, कर लेते हैं, ये पासे।


कुछ तो है

इनमे,

शेष!

जो है

विशेष!

जो अपने 

उछलने से पहले, 

खिलाड़ी के दिल को ही 

उछाल देते हैं।

वे बैठते तो हैं बिसात पर, 

पर, उन्हें सपनों के महलों में 

पहले ही बैठा देते हैं।


हे!

बिभीतक पुत्र*

तुम खिलाड़ियों के

मन, हृदय को फुसलाते

आंतरिक स्नेहन हो!

बिना युद्ध लड़े!

कोई करतब किए! 

किसी भी मृगया पर गए!

न जाने 

कबसे, कितने, 

राजों, महाराजाओ,

धनाड्यो की 

आशा, विलास और पतन के 

खिलखिलाते हंसते, 

मुस्कुराते माध्यम हो।


पांसे के साथ

मात्र एक 

भाग्यशाली का भाग्य, 

शेष सबका दुर्भाग्य 

आपस में गूढ़ निगूढ़ 

सिले होते है।

यह सब कुछ जानते हुए भी

खेलने वाले कभी भी

इनसे अपने मन से दूर 

नहीं होते ।


सोचता हूं, दुनियां में

जिसे, जो कुछ, मिला है

ज्यादातर इस पांसे सा ही फिसलते

आपस में मिलते, बदलते, भाग्य सा 

ही तो मिला है।

पैदा होना 

मेरा 

या सभी का

अनजान दंपति के घर, 

मां-पिता, दादा-दादी, भाई-बहन।

पुश्तैनी-जायदाद हो, या 

मिलना घर-आंगन,

बिन प्रयास, बिन कर्म।

क्या हमारे लिए 

एक फेंका गया 

पांसा नहीं था।

पर विशेषता इसकी, यही है,

परिणाम से हर कोई, खुशी है।

जिसने भी फेंका होगा

सबके लिए पांसा।

निश्चित ही प्रेम करुणा से

भरा रहा होगा 

उसका मन और माथा। 


इस प्राकृतिक 

जुआ फेंक खेल में

अपने अपने मिले परिणाम को

दुनियां में, 

आने वाला 

हर खिलाड़ी।

आराम से अपना लेता है,

बिना लड़े, किसी से कोई लड़ाई

बिना झगडे, उसी को

भाग्य मानकर जी लेता है।


देखिए न,

बिना 

किसी मन मुटाव, 

भटकाव, दुराव 

सब कुछ में 

इतना अंतर! 

होने पर भी 

बच्चे, मां पिता को,

मां पिता, बच्चे को, 

कितना! खुश होकर! 

कितने प्रेम से अपना लेते हैं।

जो जिसके हिस्से आया 

उसे ही पूरा प्यार देते हैं।


अब जीवन में अपने लिए 

इस पांसे को

फेंकने की बारी ..मेरी थी,

दांव पर क्या कुछ,

नहीं था इस दुनियां का,

सब कुछ जीत सकता था मैं !

बस उसे जीतने की 

जिम्मेदारी मेरी थी!


खेला भी 

बड़े मन से, 

परिश्रम से

मिला भी, 

गया भी, 

क्योंकि नियम था।

खेलने के लिए, 

खेल में सीमित चांस मिलते हैं।

एक बार खेल लेने पर 

जो चीज जिसे

जैसी भी जीत में मिल जाए

उसी के साथ सब जिंदगी

गुजार देते हैं। 


कोई एक ही अब चुनना था

कोई एक नारी, 

कोई एक नौकरी, 

कोई एक बास और 

कोई एक पति ही मिलना था।

संतानों के लिए दो से तीन 

चांस तो मिलते थे।

लेकिन, लोग एक से दो 

फेक कर ही 

थके थके बैठे थे। 

गर सच कहूं तो

ये लोग कुछ ज्यादा ही

आगे की सोच सोच डरते थे।


पासा फेंका गया, 

हर बार, 

मिला भी 

वह सबकुछ

जो जो मिलना था।

आगे अब क्या कहूं, 

इस पासे ने

कभी जान नहीं छोड़ी।

मैं अनेकों बार 

आंखे बंद कर इसे

फेंकता रहा, 

यह पलटता फिसलता

उल्टा सीधा पड़ता रहा।


ये पांसा आगे आगे, 

जिंदगी इसके पीछे, 

लाटरी में मकान,

भाग्य से दुकान,

बगल वाले से परेशान

बच्चों के अनूठे अरमान

क्या क्या कहूं 

सब जुए के पांसे सा 

जब, जहां, जैसे मिला 

चुपचाप वही लेना था।

यार सच मानो 

यह जिंदगी जूओं का खेल थी।

फिर भी कुछ खुशियां तो दे ही गई, 

जो मेरे लिए अनमोल थीं।

जय प्रकाश मिश्र






Comments

Popular posts from this blog

मेरी, छोटी… सी, बेटी बड़ी हो गई.. जब वो.. पर्दे से

पेंशन बिन जिंदगी, मेरी ये खाली हो गई है।

चलो पेरिस की एक शाम से मिलें!