लेखनी ले लिख रहे आगे, पीछे मिटाते जा रहे हैं।
सुबह की बदली घिरी है
टपकता रस,
बूंद बनकर
टप टपाटप,
पत्तियों पर।
शांत है,
परिवेश ऐसा:
शांत है
“कक्षा
किसी स्कूल की”
लग रहा
टीचर कोई
आता
दिखा है बालकों को
इधर ही अपनी तरफ।
पशु पखेरू
नीड में
चुपचाप ही,
बैठे हुए हैं।
श्रम वीर ही
कुछ दीखते
बाहर इधर।
पत्तियों हैं, चुप !
खरगोश सा ले कान!
ऊपर अकनती
परिवेश को हैं,
बूंद की टप टप से ही
हिल डुल रही हैं।
माहौल का सब
ध्वनि प्रदूषण
जाने कहां पर
गुम हुआ,
पवन भी हो शांत
सब कुछ देखता है,
खड़ा होकर।
माहौल भारी हो गया है,
आप में गुमसुम हुआ है।
एक हल्का
वाद्य टिप टिप
कभी दूर… से
….नजदीक से
अंतरा ले.. बज रहा है।
नेपथ्य से कोइ गीत,
धुन संगीत की
ध्वनि, समेटे बज रहा है।
लग रहा है
तार वीना का
किसी अनजान शिशु
के हाथ से ही छू रहा है।
टप टपर
टापर टुपुर
इस शांति पर
कुछ लिख रही है।
पत्तियों के गहवरो में
छुपते अंधेरे, प्रात में,
जो प्रात की किरणों से
बच कर रह गए थे ,
बदलियों के घेरने से
शक्ति थोड़ी पा गए हैं।
सूर्य की किरणे
कहीं उन बादलों में खो गई है,
बदलियों की श्यामता को
ढूंढती वो थक गई हैं।
शांत है,
सब कुछ, यहां पर
शांत है।
युद्ध के पहले सा
कुछ माहौल है।
लोग चिंतित लग रहे है,
भीगने से डर रहे हैं,
काम पर जाऊं न जाऊं
सोचकर चुप चुप खड़े हैं।
दो पखेरु थके से
एक साथ उड़ कर
जा रहे हैं
आकाश के इस
चमकते से रजत पट पर
लेखनी से
लिख रहे आगे,
पीछे मिटाते जा रहे हैं।
संभ्रम सा
कुछ माहौल है,
जैसे प्रसव होने को है,
शीतता तो है, यहां
पर उमस भी चंहुओर है।
चिड़ियों एक दल
था सलोना
उड़ गया आकाश में,
संघे शक्तिः वर्तते
चुप कह गया मेरे कान में।
बादलों का दल
लिए आकंठ तक हैं जल यहां,
विश्राम की मुद्रा में,
गुमसुम,
थकते थकाते हो गए है।
एक में मिल बैठकर
थोड़ा समस कर
मंत्रणा सी कर रहे हैं।
यहां बरसें!
आगे जाएं !
है कहां ज्यादा जरूरत!
सोचते!
स्थिर खड़े है।
देखतीं ये पत्तियां,
ये पेड़, धरती तृषित होकर
ऊपर टंगी जल की राशि की उस,
चाहना में, शांत
कितनी हो गई हैं।
पवन वाहन
बादलों का
देख कर हालात सारा,
दुबक कर
इन पत्तियों में
खो गया है।
याद आते ही
प्रिया की
एक पक्षी
चुप अकेला जा रहा
आकाश में,
छोड़ कर वो
भूख अपनी
भूल कर अपनी व्यथा
प्रेम में आबद्ध होकर
त्वरित गति से उड़ रहा है।
एक गौरैया मेरे ही
पास आकर कह रही है;
है कहां मेरा ठिकाना !
इस भरे बरसात में !
क्या
है कोई मानव !
भला इस छोर पर इस ?
हम पंछियों की सुधि जिसे है।
मेरे बारे में, भी
जो कुछ सोचता हो!
मोतियों सा
बूंद लेकर
कनखियों में
पत्तियां यह कह रही हैं
खुश हूं मैं
देखो न सुंदर
कनफूल
पहने आ गई हूं
द्वार पर, स्नान कर कर।
जय प्रकाश मिश्र
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