पाहुंने, प्रिय पाहुंने, है मेघ।
एक बार
'फिर' आए हैं
“बादल” 🌫️
नेह वश...,
ही घर..., हमारे...,
पाहुंने.. हैं।
दूर से,
निशि-दिन..
सतत-चल..
ग्रीष्म-सहकर..,
साथ में
सबके लिए
शीतल-मधुर.... 🌨️
जल.... लाए हैं।
गान कर... इनके लिए.. 🗣️
तूं, शब्द रच.. इनके लिए..। 🎙️
देख कर
'तपती' धरा.. के
कष्ट को,
'सूखती' वनराजि... की
नव कोंपलों.. को,
अति धूप से झुक..
नमित... होती पत्तियों को, 🍂
प्यार की सौगात
शीतल.. छांव.., 🌬️
को ले साथ
अपने आए हैं।
प्रिय पाहुंने.. हैं मेघ..
मेरे घर आए हैं।
गान... कर इनके लिए.. 🎙️
तूं, शब्द.. रच इनके लिए..। ✍️
तेज तपती लूह
चलती थी जहां
आग सी जलती
दिशाएं थीं यहां,
रात दिन, जड़ जीव
मानव तन विकल, 😮💨
तन ही विकल तो था नहीं
मन भी विकल। 😴
'उपचार' कर ☔
उस पवन का
‘नम.. मृदुल..’ कर,
झर झरित झरनो की लिए 🏞️
शीतल... पवन...
मेघ पाहुंन आए हैं।
गान कर.. इनके लिए.. 🎙️
तूं, शब्द रच.. इनके लिए..। 🖊️
प्रिय पाहुंने हैं मेघ.. अपने,
देख इनका, तन सरस.. है,
मन सरस..
नेह.. लेकर साथ अपने
रिमझिमी.. बरसात..
को ले संग अपने आए है।
साथ में हैं बदलियां, 🌨️🌨️
कुछ सांवली सी,
जब झमझमाते बरसते हैं। 🫧
खुशी में सब भींगते हैं।
बात करती पत्तियां हैं फुनगियोंं पर
आह! क्या सुख !
जल कणों की धार में है !
गिर रहीं सुकुमार कोमल,
अंग ऊपर;
उर्ध्व, तिरछी, तीर सी,
कुछ चोट करती
गात पर ।
तो सच कहूं, एक
गुदगुदी सी है लग रही है, 🥰
मुझे भीतर।
गान कर.. इनके लिए.. 🎙️
तूं, शब्द रच.. इनके लिए..। 🖊️
गिरती बूंदे, पत्तियों की
बुदबुदाती, कह रही हैं,
जंगलों के बीच में
डेरा कहीं है बादलों का
अंग उनके मिल रहे
कुछ इस तरह
एक दूसरे से,
देख तो !
वर्षात कैसी हो रही है!
घेर कर, चहुंओर से
ले गोद में क्या हो रहा है,
बिजलियां क्यों कड़कड़ाती
उंजियार इतना कर रही हैं।
बदलियां हटती नहीं है,
पास कितने आ गईं है
यह पवन खिलवाड़ करता
बालकों सा फिर रहा है, बीच में।
बादलों ने बूंद का रेला लगाया
विपिन तर है,धरा तर है,
पेड़ पौधे तृप्त हैं, जल प्लवन है।
पाहुंने प्रिय पाहुंने है मेघ जग के
शब्द की रचना करो
अर्घ्य अर्थों का चढ़ाओ।
जय प्रकाश मिश्र
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