वेणु, वीना से कहे चुप रह सुनने दे मुझे।

सूर्य का तेज 

ललाट से स्वर्णाभ सा

टप टप टपकाते,

काली पुतलियों के काले 

अंधेरों बीच, काल से! 

हजारों जगनुओं की द्युति 

बांधे, चम-चम चमकाते।


देह मोतियों सी स्निग्ध, 

शीतल, धवल, 

औदार्य से भारित 

झुके झुके अग्र अंग संग।

नतमस्तक होती सी

चतुर्दिश प्रशांति को 

पृष्ठभूमि में सजाए।


अंतः प्रदीप्तित, 

लावण्य लिम्पित, 

पूर्ण चंद्रिका का मुख मंडल लिए 

पुष्प सी प्रमुदित

प्रेम पगी, प्रणय बिद्ध 

जग कल्याण भाव निहित।


रात अंधेरे अकेले 

एक दिन मेरे  

भी समीप प्रगटी।

मैने पूछा! आप कौन!

बोली, इड़ा हूं!

सृष्टि का आधार।

पर अधूरी, 

नहीं पूरी, 

शशि सी विकल, 

निशि दिन सतत

चक्कर लगाती थक गई हूं।


शीतल तरल तन मन लिए 

चंचल मधुर, चितवन लिए

मृगी सी बेहाल तकती फिर रही हूं 

क्या कहीं कोई शांति का 

झुरमुट यहां है, खोजती हूं।


नीलिमा की छत्र ओढ़े सो रहा

जो विपुल सागर! 

तरल मन उसका मेरे भीतर कहीं पर

धड़कता है !


क्या करूं बेहाल हूं !

लहलहाती लहर का यह

जाल लेकर घूमती हूं,

डूब की इस नाव में 

चिर नवल, 

आकांक्षा 

की पाल लेकर

हेरती हूं, मौन के मझधार को 

जिसमे डूबा दूं मन अपने  को आज ही,

निश्चय अकेले सोचती हूं।


मुक्त हो, 

मैं भी फिरूं 

दूर हो इन बंधनों से।

प्रकृति ने बांधे है 

जो मेरे मन से तन से

बीती हुई सदियों, जतन से।


मैं देखता ही रह गया

उस झिलमिलाती

स्पंद लेती, आभामयी 

के रूप भीतर 

धैर्य के सामर्थ्य की उस शक्ति ने

अधीरता को थाम रखा था, 

वहां कुछ इस तरह

ज्यूं मां, हठीले परम चंचल  

बालकों को गोद में

सरल ही है थाम रखती है सहज मन से।

वह प्रीति-बद्धा थी, 

स्वतः बह उठती थी।

सुंदर, मोहक, अमृत सा मन 

झरते फूलों सी स्मित, नलिन नयन, 

बहती बयार मलय पवन।

पहली बार मैने देखा ऐसा कुछ 

इस बीतते पथ जीवन।

अपने पथ पर अडिग 

संतुलित संतुलन।

ध्रुवा सी निष्कंपन, 

लिए अविकारी चरन।


कैसा रूप, कैसी छवि 

अनंत आकाश, आंखों में खत्म 

सागर सी गहराई लिए

शांति मानसरोवर सी, 

नवपुष्प सी स्निग्ध, 

स्वच्छ नवल बूंदों सी।

हीरे की द्युतियां छलकाती,

पृष्ठों से वापस करती भग्न मनोरथ।

तराशा हीरा ही हो ऐसी नख द्युति।

रस छलके, वाणी से कुछ ऐसे, 

वेणु, वीना से कहे चुप रह

सुनने दे मुझको।


जय प्रकाश मिश्र





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