क्षीर सागर के उफनते झाग सा ये वर्ण तेरा

उछलते छंद: 1

सच बता, सच्ची.. कह

है कोई.. सच्चा.. साथ।

मन तन अपना है नहीं

दुनियां की क्या.. बात।  👣

उछलते छंद -2

यह जिंदगी है, यार

कोई… रास्ता नहीं

आगे… बढ़ा कदम 

पीछे, लौटता.. नहीं।   🏃

उछलते छंद -3

ये उम्र की ऐंठन.. है

कभी छोड़ती.. नहीं

जो भी करो.. जतन

पीछा..छोड़ती नहीं।   😁

उछलते छंद -4

तुममें, मुझमें., फर्क था,

हम उम्र थे तो क्या हुआ;

तेरा इंतजार 

किसी... एक* का था।  🫣

मेरा इंतजार 

उस एक*… का था।   😮‍💨


बीतता जग जा रहा है

रूप की 

सरिता ये

बहती 

एक दिन, 

समय की 

रेत में 

मिलकर 

कहीं छिप 

जाएगी।

सलोनी,

आंख का जादू, 

बिछलती 

मुस्कुराहट,

निराले केश 

नागिन से 

फिसलते 

झिलमिले, 

ये बिछलन रूप की, 

साम्राज्य यह सौंदर्य का

अनछुए पहलू तुम्हारे, 

अनकही वो दास्तानें,

सब यहीं मिट जाएंगी,

सब यहीं मिट जाएगी। 🌀


क्षीर सागर के उफनते 

झाग सा, ये वर्ण तेरा,   🧏

एक दिन रस हीन होकर

काल की गति में समा 

खो जाएगा।     🌪️

देखते ही देखते

ये रस भरे से 

अधर तेरे    😻

रसहीन से

निर्जीव होकर

काल के इस गर्त में

जाने कहाँ खो जाएंगे।  🫧

जय प्रकाश मिश्र








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