एक चिड़िया उड़ी आकाश।
एक छोटी बच्ची जो प्राथमिक शिक्षा के लिए अपने दादू के साथ स्कूल जा रही थी, उसने अपने दादू से पूछा दादू मैं स्कूल में पढ़ लिख कर क्या करूंगी। तो बूढ़े दादू ने उसे समझाया की पढ़ाई से क्या क्या लाभ होंगे। इसी पर पंक्तियां पढ़े।
चिड़िया से उस छोटी नन्ही बालिका को संबोधित किया गया है।
एक चिड़िया उड़ी आकाश,
आकाश जा के क्या करेगी।
मुक्त गगन में.... पेंग.. भरेगी,
समझेगी.... सारा.... संसार।
आकाश जाके... ज्ञान भरेगी।
दुनियां के वो दुःख दर्द हरेगी,
बंधे पंछी... करेगी... आजाद,
आकाश जा के... बंध तोड़ेगी।
भेद भाव को.... दूर.....करेगी
सबमें.... भरेगी.... उत्साह...।
आकाश जा के शक्ति भरेगी।
पढ़ लिख कर जब आगे बढ़ेगी
सबको...... दिखाएगी..... राह।
आकाश जा के... ज्ञान.. भरेगी।
दुनियां को... नवजीवन.... देगी
निबलों की.... होगी पतवार....।
आकाश जा के.... भ्रांति.. हरेगी।
चिड़ियों की.... ये ऊंची... उड़ान,
जब सबकी..... बनेगी पहचान..।
तभी.... बदलेगा सारा.... संसार,
तभी..... आएगी सच्ची.... बहार।
चिड़िया स्कूल जा के यही करेगी।
द्वितीय पदक्षेप
मैं फिर पालूंगा,
उन बच्चों को
जिनके मुंह मुस्काएँगे,
मैं फिर रोपूंगा,
उन पौधों को
जिनमे गुल लहराएंगे।
मैं इसी धरा पर
सुंदर सुदर,
रूप नवल लहराउंगा,
मैं नही विजित
मैं सदा विजेता,
दुनिया नई बसाउंगा।
यह वही धरा है
जिसपर शाश्वत,
सत्य खिला करता है।
यह वही धरा है
जिस पर अविरल
जल निर्मल बहता है।
यह वही धरा है
जिसपर नित नव,
पुष्प खिला करते हैं,
यह वही धरा है
जिसपर शिशु
किलकारी नित भरते हैं।
जय प्रकाश मिश्र
जय प्रकाश मिश्र
अदृतीय रचना , नव निर्माण, नया सृजन, एवं समाज को एक नयी दिशा मे कुछ और बेहतर करने की कोशिश ।
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