वह! आखिर इसी दुनियां का मालिक तो है
बहुत बड़ी चीजे या बहुत बड़े लोग भी अपने भीतर सामान्य ही होते हैं। उनमें जन सामान्य से बहुत ज्यादा अलौकिक, कुछ अलग, नहीं होता। जो लोगों के लिए पैनिक या बहुत महत्व का लगता है वही वहां अपने स्वभाव में चुपचाप पड़ा रहता है। और जिसे हम अद्भुत और सौभाग्य कहते हैं वह सभी कुछ वहां अपनी सामान्य स्कोप में ही शांत पड़ा रहता है। अतः हमे अपने में गुरुत्व और पूर्ण मर्यादा से जीवन जीना चाहिए। बहुत बड़ा बनने, श्रेष्ठ तम होने के लिए व्यथित नहीं होना चाहिए। इसी पर आज की पंक्तियां आपको नजर की जा रही हैं।
वह विशाल!
वह विराट !
जिससे सारे धर्म
करते हों याचना।
कैसा होगा ?
हम लोगों के लिए तो
असीमित…अद्भुत.,
सोच से, कुछ ज्यादा बड़ा…
कुछ अलग होगा।
पर वह! आखिर 'इसी दुनियां'
का ही तो मालिक है।
और इसलिए उसकी सत्ता
कही पर सीमित तो होगी,
क्या इसी दुनियां तक।
हम सब…और ये… सब कुछ
…को मिलाकर ही तो आखिर
वो… बड़ा बना हुआ है।
फिर सोचता हूं,
अगर अलग भी हुआ
तो क्या अलग होगा।
हां शायद!
भीतर मृत्यु बंधी होंगीं,
आंगन के कोनों में उसके।
असहाय! बिचारी!
छटपटाती, अधमरी सी,
अनेक प्राणियों की पर एक ही मापों में।
अनेक आकाश गंगाओं
से संबद्ध, काल चक्र
आपस में फुसफुसाते,
कुछ कुछ दूरियों पर
नाचते, चुपचाप
मिमियाते चराचराते
घूम रहे होंगे,
अपने अपने एकांतो में,
अकेले अपनी धुन में,
सतत, अनवरत, ऊबे हुए,
निस्तेज! पुराने।
एक सी गति में घूमते।
खोजने पर भी
नहीं दिखाई दी वहां
कोई, चहल, पहल,
त्वरा, चत्वरा
ढेरों के ढेर सुख, दुख
आनंद, स्वाद, सुगंध, सौभाग्य
सौंदर्य, शक्ति, राग, वैराग्य
अपने विपर्ययो के साथ
बिखरे पड़े थे अत्र तत्र,
और क्या रहता वहां
स्टोर में रखे
सामानों से इतर,
अलग तरह।
अनेकों ब्रह्मांडों की
रचना होती गर्भ में तैरती दिखी।
जिसे हम विनाश कहते हैं
वो उद्भव और सृजन का ही
क्रम है, वहां देखा मैने।
अनुशासन में खड़े थे
पांचों तत्व,
आग, पानी, आकाश,
पवन और ये धरा
लाइन से
अपनी निसर्ग
पवित्रता में,
चुपचाप नीचे
सर झुकाए।
अपनी अपनी
पांचों तन्मात्राओं संग,
पंचस्कंध रूप, वेदना, संज्ञा,
संस्कार और विज्ञान में रह तंग।
उंगली पकड़े खड़ी हैं,
अपने अपने तत्वों की शक्तियां
अगला आदेश क्या है
उनके लिए।
और वह विशाल, विराट इन सबके साथ
अन्मनस्क सा खड़ा था।
क्रमशः
जय प्रकाश मिश्र
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